डा. विष्णु राजगढि़या
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| संस्मरण सुनाते हरिवंश |
प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश को पढ़ना और सुनना यूं भी काफी दिलचस्प, प्रेरक और ज्ञानवर्द्धक होता है। वह भी जब विषय बिलकुल लीक से हटकर हो। यही कारण है कि सात जुलाई 2011 की शाम सात बजे विकास भारती में ‘एक शाम, हरिवंश के नाम‘ कार्यक्रम के लिए श्री अशोक भगत का बुलावा आया तो मैंने इसमें जाना जरूरी समझा।
श्री अशोक भगत ने इसमें अपने करीबी चुनिंदा सामाजिक कार्यकत्र्ताओं, अधिकारियों, बुद्धिजीवियों, नागरिकों को ही न्यौता था। यह कोई मीडिया इवेंट भी नहीं था। न छायाकारों की भीड़भाड़, न टीवी कैमरामैनों की आपाधापी। न ‘शहर में आज‘ स्तंभ में कोई सूचना, न कल के अखबार में कोई खबर। न मंच पर कोई कुरसी, न स्वागत, धन्यवाद और वक्तव्यों का सिलसिला। यहां तक कि खुद प्रभात खबर के सहकर्मी भी कार्यक्रम में नजर नहीं आये, जो हरिवंश जी के लिए यह आयोजन निहायत व्यक्तिगत और सादगीपूर्ण होने का एक और संकेत था। बगैर किसी औपचारिकता तत्काल विषय पर आने से पहले हरिवंश जी ने इस आयोजन के शीर्षक ‘एक शाम हरिवंश के नाम‘ को स्वप्रचार से दूर रहने के अपने स्वभाव के प्रतिकूल होने का बेहद विनम्र संकोच के साथ उल्लेख करते हुए उपस्थित प्रियजनों को सीधे संबोधित किया।
विषय भी कम दिलचस्प नहीं था - ‘कैलाश मानसरोवर यात्रा के संस्मरण‘। पिछले महीने चिन्मय मिशन के स्वामी माधवानंद जी के साथ कैलाश मानसरोवर परिक्रमा पर गयी टीम में हरिवंश भी शामिल थे। ऐसी किसी यात्रा से लौटकर कोई अपने संस्करण किस तरह सुनायेगा, इसकी कल्पना की जा सकती है। लेकिन वह व्यक्ति अगर हरिवंश हो, तो उन्हें जानने वालों के कौतूहल की मात्रा काफी अधिक होना स्वाभाविक है।
हरिवंश जी किसी भी विषय पर लिखने, बोलने या निर्णय लेने से पहले काफी पूर्व तैयारी, शोध और अध्ययन करते हैं। लेकिन ठीक यही चीज कैलाश मानसरोवर की यात्रा और इससे जुड़े संस्मरण सुनाने से दौरान भी करेंगे, ऐसा एहसास नहीं था।
संस्मरण की शुरूआत उन्होंने कैलाश मानसरोवर से जुड़े अपनी पूर्व धारणाओं और इससे संबंधित पुस्तकों के अध्ययन से हासिल जानकारियों के आधार पर की। विभिन्न लेखकों की पुस्तकों के अंश उद्धृत करते हुए उन्होंने बताया कि किस तरह यात्रा में जाने से पहले इनके अध्ययन के जरिये कैलाश मानसरोवर से जुड़े एक-एक पहलू की बारीकी से जानकारी हासिल करने का प्रयास किया। यात्रा की पृष्ठभूमि कैसे बनी, क्यों वह इसी वर्ष इस यात्रा के लिए उत्सुक थे, स्वामी माधवानंद के सहयोग से कैसे यह यात्रा संभव हो सकी और फिर किस तरह सहयात्रियों के साथ उन्होंने इस कष्टसाध्य यात्रा को हंसते-हंसते पूरा किया, इसका सारा विवरण। इसे सुनना जितना रोचक था, उतना ही ज्ञानवर्द्धक।
यात्रा के दौरान हरिवंश ने अपने कैमरे से ढेर सारी तसवीरें भी लीं। बताया कि किस तरह पहली बार एक छायाकार की तरह फोटोग्राफी का आनंद लिया। इन तसवीरों को प्रोजेक्टर के माध्यम से बड़े परदे पर दिखाते हुए हरिवंश ने एक-एक मनोरम दृश्य का वर्णन करते हुए मानो पूरे कैलाश मानसरोवर को श्रोताओं के सामने साक्षात प्रस्तुत कर दिया। खुद किस तरह के दड़बेनुमा कमरों में रात गुजारते थे, इसकी भी तसवीरें। जिन यात्रियों के पास बेहतर साधन नहीं होते, वे किस तरह तंबूओं में रात गुजारते हैं, ऐसी तसवीरें लेना भी नहीं भूले हरिवंश। जाहिर है कि समाजवादी पृष्ठभूमि उन्हें इस दौरान भी हैव्स और हैव नोट का फर्क देखने की दृष्टि दे रही थी।
इस दौरान उन्होंने सहयात्रियों की कुछ समूह-तसवीरें भी दिखायीं। इन तसवीरों में हम हरिवंश को तलाशते हुए भूल चुके थे कि छायाकार तो खुद हरिवंश थे। श्रोताओं में बैठे स्वामी माधवानंद ने एक बार चुटकी लेते हुए कहा भी- इन तसवीरों में आपको हरिवंश नहीं मिलेंगे क्योंकि फोटो तो खुद हरिवंश ही उठा रहे हैं। हालांकि बाद की एक-दो तसवीरों में हरिवंश भी दिखे, अधपकी बढ़ी दाढ़ी और अदम्य ऊर्जा से दमकता खिलखिलाता चेहरा।
एक-एक पड़ाव से जुड़े रोचक प्रसंग, स्थानीय विशिष्टताओं का वर्णन और उनसे जुड़ी मान्यताओं पर अपना नजरिया। संस्मरण सुनते हुए हैरान था कि कैसे कोई आदमी किसी विषय पर इतने विस्तार से जाकर पढ़, सोच, देख सकता है और कैसे अपनी स्मृतियों का अंग बनाते हुए इतने सहज एवं रोचक तरीके से दूसरों को सुना सकता है। नेपाल के रास्ते चीन में प्रवेश के दौरान नेपाल-चीन सीमा पर घंटों किसी आम आदमी की तरह इंतजार और सुरक्षा जांच की उबाऊ प्रक्रिया से गुजरने का प्रसंग हो या फिर चीन द्वारा कैलाश मानसरोवर यात्रियों को कोई वीजा नहीं दिये जाने की वजहों का विवरण, खतरनाक रास्तों से गुजरने का रोमांच हो या फिर मामूली कमरों में बेहद कम सुविधाओं के साथ रात बिताने और शौचालय के अभाव में नित्य-क्रिया के लिए खुले मैदान में जाने जैसी स्थितियों को सहर्ष स्वीकारने जैसे प्रसंग काफी दिलचस्प रहे। एक रात किसी ने रजाई उठा ली और कड़कती ठंढ़ की रात गुजारने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था की मशक्कत हो, या फिर एक रात श्वांस संबंधी परेशानी आने के बावजूद सहयात्रियों की परेशानी का ध्यान रखते हुए चुपचाप सहन कर लेने से जुड़े अनुभव भी कम रोचक व प्रेरक नहीं थे। अध्ययनशीलता का ही नतीजा है कि एक रात बाहर निकलने से पहले उन्हें हिंसक कुत्तों से किसी खतरे के बोध ने सावधान किया। ब्रह्मपुत्र नदी से जुड़े प्रसंगों को अपनी पूर्व स्मृतियों से जोड़ते हुए भविष्य के खतरों से जोड़ते हुए चीन और भारत संबंधों की चर्चा करके हरिवंश ने जाहिर कर दिया कि ऐसी यात्राओं के क्रम में कितने विविध आयामों को देखा, समझा जा सकता है।
कैलाश मानसरोवर की यात्रा को धार्मिक एवं आध्यात्मिक पहलुओं से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन अपनी पृष्ठभूमि के अनुरूप हरिवंश ने इसे महज धार्मिक या आध्यात्मिक कर्मकांड के बजाय प्रकृति व सृष्टि की अद्भुत रचना और रहस्यों से जोड़कर देखते हुए इससे जुड़ी विविध मान्यताओं और अवधारणाओं पर विस्तार से चर्चा की। उन्हें एक अलग नजरिये से देखने और समझने की कोशिश करते हुए नये आयाम दिये। निश्चय ही इस संस्मरण के श्रोताओं को इन विषयों पर अलग तरीके से सोचने की दृष्टि मिली और संयोगवश भविष्य में किसी को ऐसी यात्रा का अवसर मिले तो वह एक बार उस नजरिये से देखने की कोशिश करेगा।ऐसे किसी धार्मिक केंद्र की यात्रा से पहले जब दूसरे लोगों अपने मामूली या जरूरी सुविधाओं की चिंता करने और उन्हें सहेजने-समेटने की लाजिस्टिक चीजों तक अपनी सारी ऊर्जा केंद्रित रख छोड़ते हों, तब श्री हरिवंश का उस यात्रा से पहले ऐसा गहन अध्ययन-मनन करना और यात्रा के दौरान हरेक पहलू का ऐसा बारीक पर्यवेक्षण वाकई अनुकरणीय है। विकास भारती के सचिव श्री अशोक भगत को धन्यवाद, जिनके सौजन्य से इस सुखद प्रसंग का सहभागी होने का अवसर मिला।


written by Vikas Sinha, July 12, 2011
ReplyDeleteArvind jee, agar aap Harivansh jee ko sune ya padhe tau aap bhi manenge ki unme kuch khas hai. Hamare samay ke jo bhi aise log hai, unase sikhane ki koshish honi chahiye. Bhadas ko thanks.
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written by Hemant, July 11, 2011
bahut hi accha laga! Kya aap Bhagat jee se kah kar mera nam bhi amantariton ki list mein salwane ka subh karya karenge!--
Hemant/HEC
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written by Samir lohia, July 11, 2011
Very well written Vishnuji,even I had the privilege to attend the function and I fully agree with your views.
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written by Sanjeev, July 11, 2011
It is very inspiring and educative. Kaash, hame bhi sunane ka mauka milta
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