डा. विष्णु राजगढि़या
रांची: 11-04-10- झारखंड सरकार ने 30 जून से पहले पंचायत चुनाव कराने की घोषणा कर दी है। इससे राज्य में विकास के नये रास्ते खुलेंगे। बत्तीस साल से झारखंड में पंचायत चुनाव नहीं हुए हैं। इसके कारण ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय स्वशासन पूरी तरह ध्वस्त है। नयी पीढ़ी को पंचायती व्यवस्था के बारे में कुछ पता नहीं। पुरानी पीढ़ी भी इसके बारे में सब कुछ भूल चुकी है। अब पंचायत चुनाव के साथ ही सारी प्रक्रिया नये सिरे से शुरू होने की उम्मीद की जा रही है।
हालांकि पेसा कानून के तहत कराये जा रहे पंचायत चुनाव पर कुछ सदान नेताओं ने तीखी प्रतिक्रिया जाहिर की है। इससे पंचायत चुनाव में विध्न उत्पन्न होने की संभावना जतायी जा रही है। फिलहाल सरकार ने दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय देते हुए हर हाल में 30 जून से पहले पंचायत चुनाव कराने की घोषणा की है। इसके अलावा, जिन नगर निकायों के चुनाव अब तक नहीं कराये गये हैं, उनके चुनाव भी मई में कराने की तैयारी कर ली गयी है।
शुक्रवार को राज्य मंत्रिपरिषद की बैठक में पंचायत चुनाव को हरी झंडी दिखा दी गयी। राज्य के मुख्य सचिव डा. एके सिंह ने इसकी विधिवत घोषणा भी कर दी। राज्य निर्वाचन आयोग से मिली सूचना के अनुसार चार चरणों में चुनाव होंगे। जून के प्रथम सप्ताह से बीस जून तक चुनाव कराये जा सकते हैं। पंचायत राज्य सचिव संतोष कुमार सत्पथी के अनुसार पंचायत चुनाव कराने के लिए विभाग के पास 75 करोड़ की राशि उपलब्ध है। चुनाव ईवीएम मशीन से कराये जायेंगे। चुनाव में 45000 इवीएम की जरूरत होगी। चुनाव के लिए 74 हजार सुरक्षाकर्मियों की आवश्यकता का आकलन किया गया है। मुख्यमंत्री ने 19 अप्रैल को सभी उपायुक्तों की बैठक बुलायी है।
मालूम हो कि स्थानीय निकायों के चुनाव नहीं होने के कारण विगत दस वर्षों में झारखंड को लगभग 2200 करोड़ की केंद्रीय सहायता से वंचित होना पड़ा। इसके अलावा, ग्रामीण विकास एवं शहरी निकायों के कामकाज में जनभागीदारी के अभाव के कारण बिचैलियों की चांदी रही और योजनाओं में जमकर लूट हुई। अब पंचायत और नगर निकाय चुनाव से केंद्रीय सहायता मिलने और योजनाओं में लूटखसोट पर रोक लगने के रास्ते खुल जायेंगे।
पंचायत चुनाव में महिलाओं को पचास फीसदी सीटों पर आरक्षण मिलेगा। इसके लिए पंचायत चुनाव अधिनियम 2001 में जल्द ही संशोधन किया जायेगा। पेसा कानून के तहत पंचायत चुनाव होगा। राज्य के 260 में से 132 प्रखंड अनुसूचित जनजाति के लिए अधिसूचित हैं। इन 132 प्रखंडों में प्रमुख का पद अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित रहेगा। उपप्रमुख और मुखिया के पद अनारक्षित हैं। इसी तरह, अधिसूचित क्षेत्रों में मुखिया का पद अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित रहेगा। राज्य की 4562 पंचायतों में से 2071 पंचायतें अधिसूचित हैं।
पंचायत चुनाव में पेसा के पेंच को लेकर अब तक काफी विवाद रहा है। पहले भी राज्य सरकार ने पंचायत चुनाव की कोशिश की थी। अदालत में विभिन्न मुकदमों के कारण ऐसा संभव नहीं हो पा रहा था। बारह जनवरी को सर्वोच्च न्यायालय ने पेसा के तहत पंचायत चुनाव कराने का स्पष्ट निर्देश देकर सारी बाधाएं दूर कर दीं। पेसा के तहत अनुसूचित जनजाति को मिले आरक्षण पर कुछ सदान नेताओं ने आपत्ति करते हुए 13 अप्रैल को झारखंड बंद की घोषणा की है। सदान नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट एवं झारखंड हाईकोर्ट का भी दरवाजा खटखटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके कारण पंचायत चुनाव में विधि-व्यवस्था के संकट या अदालत के हस्तेक्षप के कारण बाधा उत्पन्न होने की संभावना कायम है। सत्ता का विकेंद्रीकरण करने की दिशा में सदान समुदाय का सहयोग मिलेगा तथा उनकी नाराजगी दूर हो जायेगी।
भूरिया कमेटी की अनुशंसा के आलोक में 1996 में पेसा कानून बना था। इसका पूरा नाम है- पंचायत राज विस्तार अधिनियम। देश के नौ राज्यों में पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत पेसा कानून लागू है। ये राज्य हैं- झारखंड, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश, ओडि़शा और गुजरात। इनमें झारखंड के सिवाय अन्य सभी राज्यों में पेसा के प्रावधानों के अंतर्गत पंचायत चुनाव कराये जा चुके हैं। ऐसे में सिर्फ झारखंड का पंचायत के बहुआयामी लाभों से वंचित रहना अनुचित है। लिहाजा, राज्य में पंचायत चुनाव की पहल का समाज के व्यापक हिस्सों ने स्वागत किया है और अगर सरकार इस बार चुनाव कराने में सफल होती है तो इसे राज्य की एक बड़ी उपलब्धि माना जायेगा।


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