डा. विष्णु राजगढि़या
झारखंड का राजनीतिक माहौल काफी निराशाजनक है। अलग राज्य बनने के नौ साल में सात मुख्यमंत्री बदले। इस क्रम में विकास के काम भी ठप हैं। निराशा के इस माहौल में राज्य के वरीय अधिकारियों ने गांवों और गरीबों तक सीधे पहुंचकर विकास योजनाओं का हाल जानने की अनोखी पहल की है। इससे राज्य में एक नयी उम्मीद जगी है। | रांची के एक गांव में डा. एके सिंह |
झारखंड के मुख्य सचिव श्री अशोक कुमार सिंह ने राज्य के गांवों में जाकर ग्रामीणों और गरीबों की समस्याओं को समझने और उनका त्वरित समाधान करने का सिलसिला प्रारंभ कर दिया है। सोलह मई को वह कई वरीय पदाधिकारियों के साथ रांची जिले के रातू प्रखंड की कई गांवों में पहुंचे। उन्होंने हर रविवार को राज्य के किसी एक जिले के विभिन्न गांवों का दौरा करने की घोषणा की है।
इस पहल के संबंध में मुख्य सचिव ने नई दुनिया को विस्तार से जानकारी दी। श्री सिंह के अनुसार गांवों तक आला अधिकारियों की सीधी पहुंच से विकास योजनाओं के सफल क्रियान्वयन में काफी मदद मिलेगी। अब तक हम विकास योजनाओं की समीक्षा सिर्फ आंकड़ों के आधार पर करते रहे हैं। इनमें योजनाओं की वास्तविक गुणवत्ता का पता नहीं लग पाता। कई बार आंकड़े भी गलत मिलते हैं। बहुत सी योजनाएं समय पर पूरी नहीं हो पाती। इसके मौलिक कारणों की जानकारी शीर्ष पर बैठे अधिकारियों को नहीं मिल पाती है। मेरी कोशिश है कि केंद्रीय योजनाओं तथा केंद्र प्रायोजित योजनाओं के क्रियान्वयन की वास्तविक स्थिति और जटिलता को वरीय अधिकारी स्वयं देखें और उसका व्यावहारिक हल निकाले। खासकर शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, समाज कल्याण से जुड़ी योजनाओं पर हमारी विशेष नजर है।
झारखंड के लिए यह नयी पहल है। सोलह मई को मुख्य सचिव एके सिंह ने वन विभाग, सिंचाई विभाग, कृषि विभाग, शिक्षा विभाग के आला अधिकारियों के साथ कई गांवों का दौरा किया। रांची के उपायुक्त केके सोन तथा जिले और प्रखंड के पदाधिकारी भी साथ थे। अधिकारियों ने गांवों में तालाब, कुंआ, पोखर, अस्पताल, स्कूल भवन, आंगनबाड़ी केंद्र, कृषि और सिंचाई संबंधी कार्यों का जायजा लिया। मनरेगा और वन विभाग के कार्यों का भी हाल जाना। अधिकारी यह देखकर हैरान थे कि मनरेगा के तहत बने किसी भी कुएं सीमेंट और बालू का उपयोग नहीं किया गया है। मिट्टी से जोड़कर कुआं बना दिया गया। कुंओं को धंसने से बचाने के लिए आरसीसी बैंड भी नहीं लगाया गया। मुख्य सचिव ने इस गड़बड़ी के जिम्मेवार कनीय अभियंता मो आरिफ पर कार्रवाई का तत्काल निर्देश दिया।
श्री सिंह बताते हैं कि गांव तक पहुंचने से यह मालूम होता है कि जनाकांक्षा क्या है। लोगों की जरूरत क्या है और उसे कैसे पूरा किया जाना चाहिए, इसका पता चलता है। एक महिला ने अपने खेत में बांस के पेड़ लगाने का आग्रह किया क्योंकि बांस की मांग काफी बढ़ गयी है। वह महिला जानती है कि एक बार जब बांस निकलने लगेंगे तो उससे अनवरत आय होगी। कुछ ग्रामीणों ने कटहल के पेड़ लगाने की मांग की जिससे 150 साल तक फसल होगी। इसके पत्तों से बकरी भी पल जायेगी और उसकी लकड़ी भी काफी उपयोगी होगी।
श्री सिंह के अनुसार किसानों को मालूम है कि उनकी जरूरत क्या है। लेकिन हम अपनी योजनाएं उन पर थोप देते हैं।
गांव जाने पर अधिकारियों को कई अच्छे प्रयोगों की जानकारी मिली। एक महिला ने मात्र आधा एकड़ जमीन में ड्रीप एरीगेशन के जरिये करेला उपजाकर पूरे परिवार का खर्च निकाल लिया। एसजेएसवाइ योजना में महज एक पंप और ड्रीप एरीगेशन पाइप के सहारे यह काम हो गया। लद्दा गांव में वन विभाग ने विश्व खाद्य कार्यक्रम के तहत 4.75 लाख की पेजयल आपूर्ति योजना से एक हजार लोगों को 24 घंटे पेजयल की व्यवस्था कर दी। श्री सिंह बताते हैं कि माइक्रो लिप्ट एरीगेशन योजना में पांच लाख रुपये खर्च करके 70 एकड़ जमीन में सिंचाई की सुविधा दी जा सकती है। गांव के लोग चेकडैम बनाने की मांग करते हैं क्योंकि इससे उनके कुएं में पानी आ जायेगा। एक स्कूल की क्षत की ढलाई की गयी लेकिन उसे महज सात दिनों में खोल दिया गया। इससे निर्माण की गुणवत्ता खराब हुई। क्षेत्र भ्रमण से ऐसी जानकारियां आला अधिकारियों को सीधे मिल रही है।
सामाजिक कार्यक्रर्ता सुधीर पाल इस पहल को झारखंड में प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह चैपट होने का उदाहरण मानते हैं। श्री पाल के अनुसार अगर राज्य के मुख्य सचिव को थानेदारी करनी पड़े तो इसे संसाधनों की बरबादी माना जायेगा। जरूरत इस बात की है कि सिस्टम खुद अपना काम कैसे करें, इसे सुनिश्चित किया जाये। अर्थशास्त्री डाॅ रमेश शरण कहते हैं कि यह पहल स्वागतयोग्य है। लेकिन राज्य के 32 हजार गांवों तक आला अधिकारी कितने दिनों में पहुंच सकेंगे, कहना मुश्किल है।
मुख्य सचिव एके सिंह के अनुसार यह पहल विकास योजनाओं के निरीक्षण का सिस्टम दुरूस्त करने के लिए ही किया जा रहा है। हर रविवार को किसी एक जिले के गांवों तक पहुंचने की इस योजना में मुख्य सचिव के साथ कई विभागों के सचिव शामिल रहेंगे। लेकिन यह टीम किस जिले के किस गांव में जानेवाली है, इसकी जानकारी पहले से नहीं दी जायेगी। राज्य के किसी भी जिले के किसी भी प्रखंड में यह टीम जा सकती है। इससे राज्य के सभी जिलों और प्रखंडों के अधिकारियों को हरदम सावधान रहना पड़ेगा। भ्रमण के दौरान सारे अधिकारी एक साथ नहीं घुमेंगे बल्कि हर अधिकारी अलग-अलग गांवों का दौरा करेंगे। इस तरह हर रविवार को लगभग चार प्रखंडों के तीस से चालीस गांव तक कवर हो जायेंगे। शाम को सभी अधिकारी एक जगह जुट कर क्षेत्र भ्रमण के अनुभवों पर चर्चा करेंगे और समस्याओं का हल निकालेंगे। दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई भी होगी। इस तरह सिस्टम को नये सिरे से दुरूस्त करना संभव होगा।
श्री सिंह के अनुसार क्षेत्र भ्रमण के साथ ही हर जिले और प्रखंड के अधिकारियों को योजनाओं के संबंध में मासिक लक्ष्य निर्धारित करने का निर्देश दिया गया है। योजनाएं पूरी नहीं होने पर उत्तरदायित्व सुनिश्चित करने की भी बात कही गयी है। श्री सिंह बताते हैं कि विभिन्न कारणों से अधिकारियों ने गांवों का दौरा करने और विकास योजनाओं की स्थिति खुद देखने का सिलसिला बंद कर रखा है। लेकिन जब मुख्य सचिव और कई विभागों के सचिव गांवों में जाने लगेंगे तो पूरी व्यवस्था पटरी पर आ जायेगी। अगर शीर्ष पर बैठे लोग सचिवालय में बैठकर आंकड़ों पर भरोसा करेंगे, तो निचले स्तर के अधिकारी भी कामचलाउ रवैया अपनायेंगे। डाॅ रमेश शरण आला अधिकारियों को राज्य के सुदूरवर्ती गांवों में जाने का सुझाव देते हैं। कहते हैं कि अधिकारियों को आॅपरेशन ग्रीन हंट और उग्रवाद के इलाकों में भी जाना चाहिए। हालांकि मुख्य सचिव पहले से ही इसकी तैयारी कर चुके हैं। श्री सिंह के अनुसार कुछ अधिकारियों ने उन्हें उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में नहीं जाने की सलाह दी हैं। लेकिन वह राज्य के सुदूर और उग्रवाद प्रभावित गांवों में जायेंगे। कारण यह है कि अगर उग्रवादियों का आरोप सरकार पर संवदेनहीन होने का है, तो गांवों तक पहुंचने की यह पहल सरकार के संवेदनशील होने और गरीबों के दुख दर्द से जोड़ने की कोशिश है। यह बात उग्रवादियों को आसानी से समझ में आयेगी और वे इसमें बाधा नहीं डालेंगे।
रांची के उपायुक्त केके सोन इस पहल से काफी उत्साहित हैं। श्री सोन लातेहार जिले के उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में विकास कार्यों के अनुभवों की चर्चा करते हैं। कहते हैं कि उन इलाकों में जब वह विकास योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए लगातार घुमते थे, तो उन्हें कभी भय नहीं हुआ। उग्रवाद के नाम पर विकास योजनाओं में लापरवाही से बेहतर उचित नहीं।
इस पहल के बाद अब राज्य के सुदूर गांवों को आला अधिकारियों के आने और अपनी किस्मत संवरने का इंतजार रहेगा।
No comments:
Post a Comment