Sunday, 10 July 2011

बदल रहे हैं, गांव, देहात और जंगल

हरिवंश  
 फ़रवरी 2008 में चतरा के नक्सल दृष्टि से सुपर सेंसिटिव गांवों में जाना हुआ. साथ के मित्रों के भय और आशंका के बीच, देर शाम तक घूमना हुआ. सूनी सड़कों पर मरघट की खामोशी के बीच. तब तक लिखा यह अनुभव भी छपा नहीं. पाठक पढ़ते समय ध्यान रखें यह फ़रवरी 2008 में लिखी गयी रपट है.

कभी डालटनगंज-चतरा के इन इलाकों में खूब घूमना हुआ. समाजवादी चिंतक, अब बौद्ध अध्येता व दार्शनिक कृष्णनाथजी से सुना था. कैसे लोग पत्तों को खाकर जीवन गुजारते थे? रंका में वह खुद छह माह रहे. भूख के खिलाफ़ लड़ाई में शिरकत की. जेल गये. कृष्णनाथजी से बनारस पढ़ने के दौरान मिलना हुआ. उनके व्यक्तित्व, लेखन ने असर डाला. उनका स्नेह मिला. वह कितनी ऊंचाई पर गये? आज कितने लोगों को वह याद हैं? उन पर फ़िर कभी. फ़िर रांची प्रभात खबर आना हुआ. और साबका हुआ, 1991-92 के अकाल से. प्रभात खबर, रांची के कुछ साथी, डालटनगंज के साथी, सब मिल कर सक्रिय हुए. त्रिदिव घोष, फ़ैसल अनुराग, डॉ सिद्धार्थ मुखर्जी, कर्नल बख्शी, गोकुल बसंत वगैरह के अनथक परिश्रम, प्रतिबद्धता और हर इलाके में भ्रमण से, अकाल मुद्दा बना. राहत पहुंचायी गयी. 

तब पहली बार उस इलाके में जाना हुआ. फ़िर झारखंड बनने के बाद पड़े अकाल के दौरान. 2002-2003 के बीच. कुसमाटाड़ (डालटनगंज) में जीन द्रेज के साथ जन सुनवाई क्रम में पांकी ब्लॉक भ्रमण. तत्कालीन झारखंड सरकार की आवाज दबाने की हर मुमकिन कोशिश!इस चतरा यात्रा (फ़रवरी ’08) के दौरान ये सभी पुराने अनुभव याद आये. बगरा मोड़ पहुंचते-पहुंचते तीन बज गये. वहां से प्रभात खबर से जुड़े साथियों के साथ लावालौंग के अंदरूनी गांवों में जाना हुआ. पुलिस की शब्दावली में‘सुपर सेंसिटिव’एरिया.
सड़क सूनसान थी. पक्की सड़क से उतर, कच्ची सड़क पर यात्रा शुरू हुई. सूचना मिली कि इन जगहों पर बरसों से लैंड माइन बिछी हैं. पुलिस-प्रशासन दूर ही रहना चाहते हैं. पहले एमसीसी गुट का अघोषित राज था. अब अंदरुनी अंतर्विरोध से टीपीसी जन्मा है. ताकतवर और चुनौती देनेवाला. कहते हैं, इन इलाकों में अब एमसीसी का भय घटा है. टीपीसी का दबदबा बढ़ा है.

सिमरिया उपचुनाव में टीपीसी समर्थित प्रत्याशी चुनाव में उतरी थीं. चूड़ी चुनाव चि: था. सबसे अधिक वोट इस इलाके से मिले, टीपीसी समर्थित प्रत्याशी को. बदल रहे हैं, गांव..लावालौंग से सटे गांव, कच्ची, टूटी-फ़ूटी सड़कों से जुड़े हैं. आज तक बिजली नहीं पहुंची है. उप स्वास्थ्य केंद्र कभी कभार खुलता है.
1995 में प्रखंड बना. बीडीओ नहीं बैठते. कार्यालय भवन बन रहा है. पड़ोसी प्रखंड कुंदा है. कहते हैं, एमसीसी का जन्म स्थल ये दोनों प्रखंड हैं. यहीं का घी, बांस, खैर लकड़ी और बेशकीमती जंगली लकड़ियां मशहूर थीं. लावालौंग चौक से तकरीबन 10 किमी दूर एक गांव में जलील खां मिले. कहा. 15 साल से दौड़ रहा हूं. गांव में चापानल या कुआं के लिए? पर आवेदन मैं देता हूं, काम आवंटन कहीं और होता है.
पीने के पानी के लिए नदी जाना पड़ता है. इसी गांव के राज गंझू इंटर पढ़े हैं. नौकरी की तलाश में हैं. संजीत केशरी आइएससी करके बैठे हैं. विकास भारती के अशोक भगतजी की सुनाई एक नागपुरी कहावत याद आती है. ढेर पढ़ले घर छोड़ले कम पढ़ले हर छोड़ले.बुंदेली कहावत भी है, कम पढ़े थे, हर से गये, अधिक पढ़े घर से गये.
भाषा-बोली कोई भी हो, यह भाव-चिंता हर जगह है. शिक्षा व्यवस्था कुछ ऐसी है कि युवकों को न घर का रहने देती है, न घाट का. पढ़े लिखे युवक बेकार बैठे हैं. यह बोझ कोई समाज ढो सकता है? पर गांवों की कथा-व्यथा यही है. बगल के हुटरू गांव में गाय-गो के लिए भी पानी नहीं. कपड़ा धोने के लिए इधर-उधर दौड़ते हैं. पर गांव की बच्चियां स्कूल जा रही हैं.
कुछेक साइकिल की प्रतीक्षा में भी हैं. सरकार से साइकिल मिलने की योजना चर्चित रही है.यहां एक लड़की ने साइकिल मांगी. उसका साहस देख प्रभावित हूं. आगे बढ़ने की ललक है. हक मांगने का आत्मविश्वास. पीने के पानी का संकट है. सड़क नहीं है. बिजली नहीं है. गांव में कुआं कोई और खुदवाता है, कमीशन लेता है. पढ़ कर दो लड़के बैठे हैं. इनमें से एक अंधा बच्चा भी है.

उसकी मां कह रही थी. लोकतंत्र ने बेजुबानों को बोलने की आवाज दी है. इन इलाकों को देखते हुए लगता है. सरकारी योजनाओं ने लोगों को पराश्रयी बना दिया है. उनकी निजी पहल, हुनर-उद्यम खत्म हो गये. चीन ने मछली देकर भूख शांत नहीं की, मछली मारना सिखा कर हुनर दिया. भूख मिटाने का. भारत ने परनिर्भर बनाया. हर चीज के लिए सरकार की ओर आंख. आत्मस्वभिमान खत्म. याद आते हैं.

बचपन के दिन. पीएल 480 ( अमेरिकी सहायता) के तहत विदेशी गेहूं गांवों में बंटता था. राहत के लिए. जल्द कोई लेना नहीं चाहता था. गरीब लोग भी कहते, पहले मुसमात (विधवा), लाचार, बूढ़ों और अनाथ लोगों को दें. 1991-92 के आसपास पलामू अकाल के दिनों में भी ऐसा अनुभव हुआ. बुंडू-खूंटी के कुछेक गावों में लोगों ने राहत लेने से मना कर दिया. कहा, मुफ्त चीज नहीं लेंगे.

भारतीय समाज में श्रम-स्वाभिमान की यह धारा थी. अब हालात बदल गये हैं. समाज को भी मुफ्तखोरी की आदत पड़ गयी है. लोभ-लालच का दौर है. बिना श्रम, अर्जन की भूख. सरकारी विकास संस्कृति और भ्रष्टाचार ने हमें कहां पहुंचा दिया है? इसी प्रखंड में मुलाकात हुई, लुखरी बिरहोरिन से. कहती हैं, एको लुर ढंग का घर नहीं है.

लुर शब्द सुनते ही मित्र मनोज प्रसाद याद आते हैं. वह बार-बार कहते हैं, हमारे शासकों में लुर का अभाव है. यहां बिरहोरों के लिए सरकारी घर बने हैं. टूटे-फ़ूटे, अधूरे और कमरों में अंधकार. प्रकृति के बीच खुले जीनेवालों को यह रास नहीं आ रहा. रघु बिरहोर की शिकायत है कि अब खरहा सिरा (खत्म) गया. चटाई कम बिकता है. घर चूते हैं. छत गिरती है. कहते हैं. पहले पत्ता के घर में रहते थे. वह ठीक था. जीतन बिरहोर की दोनों आंखें खराब हैं. देख नहीं पाते. 10-15 वर्षो से. कहते हैं, यहां सरकारी इंदिरा आवास में ठंड है.
पत्ता घर में ठंड नहीं थी. दो बेटे हैं. कमाने बाहर गये. आज तक नहीं लौटे. पुराने दिन याद करते हैं. जंगल सिरा गया. पहले खरहा, तितिर, मुरगा-मुरगी, खाते थे. 80 के ऊपर के हैं, पर उम्र पूछने पर कहते हैं, का पता 40-45 वर्ष होइ. आज तक किसी को वोट नहीं दिया है. दरअसल बिरहोरों के लिए बड़ा बदलाव है. हजारों वर्ष से जिस जंगल में रैन बसेरा था. घूमंतू जीवन था. शिकार व्यसन था. अब वह दुनिया खत्म हो चुकी है.
पर उनका मन वहीं अटका है. ‘सरकार-शासन’, ऐसे घूमंतू लोगों के इस संक्रमण दौर में ‘मिडवाइफ़’ की भूमिका में होते, तो यह शहरी बदलाव उन्हें पीड़ा नहीं देता. सहज, सपाट और आसान होता जीवन बदलाव. पर यह परिवर्तन रोका भी नहीं जा सकता, क्योंकि मानव समाज के मूल में टेक्नोलॉजी और बाजार की भूमिका निर्णायक है.

बदलाव पीड़ादायक होता है, पर इसी पीड़ा और दुख से तप कर ही मानव समाज पत्थर युग से यहां पहुंचा है. और ये इलाके भी बदल रहे हैं. मोबाइल फ़ोन ने इन जंगल के गांवों को भी एक सूत्र में बांधा है. शायद यही कारण है कि आधुनिकता के इन प्रतीकों को नक्सली ढाह रहे हैं. हाल में नक्सली समूहों ने पांच-छह टेलीफ़ोन टावर उड़ा दिये हैं. मोबाइल की तरह सड़कों ने भी सूरत बदली है. आवागमन और संपर्क ने सीमित दुनिया का ताना-बाना तोड़ा है.
लोगों का बाहर आना-जाना महज यात्रा नहीं होती. विचारों, बदलावों के बयार भी इन यात्रियों के साथ गांव लौटते हैं. टीवी ने दुनिया को घरों-गांवों में समेट दिया है. भोग और बेहतर जीवन की भूख की आंधी गांवों में भी बह रही है. यह उपभोक्तावाद की हवा है. बाजार भी इस बदलाव का कड़ा कारक है. इस जंगल में बसे, इन गांवों-हाटों में चाउमीन, पापकॉर्न वगैरह धड़ल्ले से मिलते हैं.
सरकारी स्कूलों में पढ़ाई हो या न हो, छात्र-छात्राएं पंक्तिबद्ध होकर जाते हैं. बैंकों में ऋण लेकर निजी रोजगार-कारोबार के भी दरवाजे खुल रहे हैं.पिछले समाज में बदलाव के माध्यम थे, विचार, राजनीतिक दल, धर्म, सामाजिक सुधार आंदोलन वगैरह. पर अब एनजीओ संगठन और ठेकेदार बन गये राजनीतिक कार्यकर्ता भी अपने-अपने ढंग से अपनी छाप छोड़ रहे हैं.
गांवों में जो मजदूर शहर गये, वे भी बदल कर लौटते हैं.इस तरह ’90 के दशक में उदारीकरण के गर्भ में अनेक तत्व निकले हैं, जो गांवों का मानस बदल रहे हैं. यह बदलाव सिंगापुर के ली क्यान यू का कथन याद दिलाता है. भारत के गांवों के शहरीकरण के बिना नया भारत नहीं बनेगा.
वह कलाम के पूरा माडल से सहमत नहीं हैं. उनका मानना है कि चीन हर वर्ष एक करोड़ चीनी लोगों को गांव से शहर में बसा रहा है. ब्राजील में भी तेज नगरीकरण हो रहा है. ली याद दिलाते हैं कि पुराने ग्रीक को याद करें. क्या सुकरात और वर्जिल गांवों में रहते थे? नहीं, वे तब के शहरों में थे, जो सुविधा संपन्न थे.
Prabhat Khabar
Palamu Bangale ke baramde mey
Desh Kaha Pahuch Gaya Hai

उग्रवाद की गोद में विकास की पहल

डा. विष्णु राजगढि़या
लगभग सत्ताइस साल पहले चार सामाजिक कार्यकर्ताओं ने नेतरहाट के वीरान इलाके बिशुनपुर में आदिवासियों के बीच विकास का अलख जगाना शुरू किया। आज वह प्रयास जादू की तरह अपना असर दिखा रहा है। उग्रवाद से गंभीर रूप से ग्रसित जिन इलाकों में पुलिस भी नहीं घुसती वहाँ भी इस संस्था की सहज पहुँच है।  विकास भारती की स्थापना 1983 में अशोक भगत, डॉ. महेश शर्मा, रजनीश अरोड़ा और स्वर्गीय डॉ. राकेश पोपली की पहल पर हुई थी। विकास भारती के वर्तमान सचिव अशोक भगत बिशनपुर के आदिवासी समुदाय के बीच कार्य करने के मिशन के साथ आए थे। उन्होंने क्षेत्र का सर्वेक्षण किया तो महसूस किया कि इस समुदाय के बीच कार्य करने के मिशन के साथ आए थे।

उन्होंने क्षेत्र का सर्वेक्षण किया तो महसूस किया कि इस समुदाय के समुचित विकास के लिए अलग किस्म के प्रयासों की जरूरत है। नेतरहाट के तल पर बसा यह प्रखंड पूरी तरह वीरान, सुप्त और उजाड़ था। जादू-टोना, टोटका, डायन-बिसाही, गैरकानूनी भूमि दखल की एक पूरी दुनिया आबाद थी। विकास के नाम पर तब यहाँ अँगरेजों के जमाने की मात्र एक पक्की सड़क थी।

जिस समय भगत यहाँ आए, उस दौर में जमींदार तेजी से आदिवासियों की जमीन हड़प रहे थे। आदिवासी समुदाय अपने परंपरागत धंधे कृषि, कारीगरी, ग्रामीण कला एवं शिल्प से दूर होते जा रहे थे। उनके 27 वर्षों की अनवरत मेहनत रंग लाई है। विकास भारती ने आज आदिवासियों में शिक्षा, अधिकार, सजगता, मानसिक ताकत एवं जागरूकता बढ़ा दी है। जागरूकता का नतीजा है कि अब ग्राम स्वराज की माँग होने लगी है। विकास भारती ने आज झारखंड के 2000 गाँव में अपना कार्य फैला लिया है। विकास भारती आदिवासी समुदाय के अंदर आत्मविश्वास कायम करने के‍ लिए और अपने लक्ष्य समुदाय, समूहों एवं व्यक्तियों को क्षमतावान बनाने के लिए कार्य करता है। 
किसी भी समुदाय के सशक्तीकरण के लिए शिक्षा सबसे शक्तिशाली साधन है। इसे देखते हुए विकास भारती ने समाज के वंचितों के तीन समूह अनाथ, विकलांग एवं व‍ंचित अथवा क्षितिजों की शिक्षा के लिए विशेष बल दिया है। अनाथ बच्चों के लिए बने श्रम निकेतन में आवासीय व्यवस्था में सभी मूलभूत सुविधाओं के साथ सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक शिक्षा दी जाती है। संस्था में शक्तिमान केंद्र हैं जो विकलांग बच्चों की विशेष आवश्यकताओं का प्रबंध करता है। प्राथमिक शिक्षा एवं व्यावसायिक कौशल प्रशिक्षण प्रदान करने के अतिरिक्त विकास भारती इन बच्चों को झारखंड के ख्‍यातिप्राप्त चिकित्सालयों में अस्थि चिकित्सा हेतु वित्तीय एवं भावनात्मक सहयोग भी प्रदान करता है।

ऐसे बच्चों तक पहुँचने के लिए जो दूरस्थता के कारण या अपने माता-पिता की आजीविका हेतु किए जाने वाले संघर्ष के कारण शिक्षा को बीच में ही छोड़ देते हैं, विकास भारतीय सर्व शिक्षा अभियान में शामिल होकर राज्य के उन दूरस्थ क्षेत्रों के बच्चों को शिक्षित करने का कार्य कर रहा है।

श्रम निकेतन, कोयलेश्वर नाथ विद्या मंदिर, जतरा टाना भगत विद्या मंदिर पास के ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों के लिए उत्कृष्ट केंद्र साबित हुए हैं। ऐसे केंद्र औपचारिक विद्यालयों से विविध कारणों से शिक्षा-वंचित बच्चों को भी आच्छादित करते हैं। शबरी आश्रम, निवेदिता आश्रम, टैगोर आश्रम, वाल्मीकि आश्रम, विश्वकर्मा आश्रम, एकलव्य आश्रम जैसे नौ आश्रमों में 12 जनजातियों के सैकड़ों बच्चे प्रशिक्षण ले रहे हैं।

सैद्धांतिक और गैर-सैद्धांतिक शिक्षा प्रदान करने हेतु औपचारिक विद्यालयों और आश्रमों के संचालन के अलावा विकास भारती सर्व शिक्षा अभियान की साझेदारी में प्राथमिक स्तर पर इन बालिकाओं के लिए शिक्षा के राष्ट्रीय कार्यक्रम -एनपीइजीइएल जो भारत सरकार का दुर्गम स्थलों में रहने वाली बालिकाओं तक पहुँचने का एक केंद्रीभूत कार्यक्रम का संचालन कर रहा है। जिन गाँवों में आँगनबाड़ी केंद्र नहीं हैं, वहाँ के बच्चों को बालपन केंद्रों के जरिये पूर्ण विद्यालयी शिक्षा देने का काम किया जा रहा है। इसके तहत अब तक 2187 बच्चों को लाभान्वित किया जा चुका है।

झारखंड विधानसभा से सेवानिवृत्त होने के बाद विकास भारती से जुड़कर सामाजिक विकास में योगदान कर रहे अयोध्यानाथ मिश्र बताते हैं कि झारखंड में ऐसी संस्थाओं के प्रयासों की बेहद आवश्यकता है। विकास भारती और इससे संबंधित संगठनों ने झारखंड के युवाओं के क्षमता विकास के लिए मुख्‍य रूप से तीन कार्यक्रम चला रखे हैं।

जनशिक्षण संस्थान, तकनीकी संसाधन केंद्र और ग्रामीण युवा ज्योति। जनशिक्षण संस्थान कार्यक्रम भारत सरकार की योजना है। इसके तहत गरीबों, निरक्षर, नवसाक्षर, अभिवंचितों और दुर्गम क्षेत्रों के लोगों, विशेषकर 15-35 आयु वर्ग के लोगों को केंद्र में रखते हुए व्यावसायिक शिक्षा प्रदान की जाती है। यह संस्थान इस अर्थ में खास है कि यह केवल कौशल विकास का ही कार्य नहीं करता बल्कि साक्षरता को व्यावसायिक कौशल से जोड़ने और लोगों को समृद्धात्मक शिक्षा बह‍ुतायत मात्रा में प्रदान करते हैं।

1985 में स्थापित ग्रामीण तकनीक केंद्र का उद्देश्य देशज तकनीक कला, शिल्प को संवर्द्धित एवं संरक्षण करना तथा ग्रामीण समुदाय को उद्यमिता विकास के विविध कौशलों पर प्रशिक्षण देना भी है। ग्रामीण युवा ज्योति योजना केवल व्यावसायिक कौशल प्रदान करने मा‍त्र के लिए नहीं है बल्कि जीवन कौशल, व्यक्तित्व विकास हेतु सुझाव और सूचना प्रदान करने का भी कार्य करता है।

एनआरएचएम और झारखंड सरकार के सहयोग से वर्ष 2007 में शुरू की गई यह योजना राज्य के 24 जिलों में चल रही है। इसके द्वारा राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित दुर्गम क्षेत्रों में स्वास्थ्‍य शिविरों का प्रबंध किया जाता है। ग्रामीण समुदाय के दरवाजे पर प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा मुहैया कराने की इस योजना के तहत अब तक 6336 शिविर आयोजित किए जा चुके हैं। इससे 862779 रोगियों ने लाभ उठाया है। चलत मोबाइल मेडिकल गाड़ी जिसमें विभिन्न तरह की जाँच सुविधा जैसे एक्स-रे, पैथोलॉजी आदि की सुविधा होती है, डॉक्टरों-विशेषज्ञों के साथ गाँव-गाँव भेजे जाते हैं। इसी तरह 2006 में शुरू किए गए चलंत पंचायत स्वास्थ्‍य कार्यकर्ता या एमपीएचडब्ल्यू के द्वारा अब तक 12 हजार 643 ग्रामीण रोगी लाभान्वित हो चुके हैं। विकास भारती के द्वारा लोगों को साफ-सफाई के प्रति सजग बनाने के लिए स्वच्छता परियोजना और संपूर्ण स्वच्छता अभियान भी चलाए जाते हैं।

कृषि क्षेत्र में राज्य को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कृषि विज्ञान केंद्र, बीज ग्राम, किसान क्लब, राष्ट्रीय बागवानी मिशन, मेसो प्रोटोटाइप जैसी योजनाएँ सफलतापूर्वक चलाई जा रही हैं। स्वयं सहायता समूह, महिला उद्योग, ग्राम तकनीकी, ग्रामीण युवा ज्योति, अंबेडकर हस्तशिल्प योजना, स्वावलंबन धारा और अन्य कार्यक्रमों के द्वारा जरूरतमंदों को आत्मनिर्भर बनाने पर काम हो रहा है।

पर्यावरण संरक्षण के संदर्भ में समाज को जागरूक करने के लिए विकास भारती ने वर्ष 2008-09 में वन, पानी, स्वास्थ्‍य-जन पहल प्रेरणा और नदी बचाओ, पारिस्थितिकी बचाओ अभियान शुरू किया। नदियों के विषय में धार्मिक भावना पैदा करने हेतु दो वर्ष पूर्व एक राज्यव्यापी गंगा दशहरा उत्सव का आयोजन किया गया। इसे 125 प्रखंडों में चलाया गया। राँची जिले में हरमू नदी का पूजन किया गया। नागरिकों ने अनुभव किया कि वह दिन दूर नहीं जब राँची शहर की जीवन रेखा समाज के कुछ प्रभावकारी परिवारों के निहित स्वार्थों के चलते समाप्त हो जाएगी।

'हरमू नदी बचाओ आंदोलन समिति' का गठन किया गया। नतीजा यह हुआ कि हरमू को बचाने के लिए प्रशासन के साथ-साथ समाज का हर तबका सामने आ गया। बरियातू स्थित विकास भारती के आरोग्य भवन में 30 प्रकार के विभिन्न व्यावसायिक पाठ्‍यक्रम चलाए जाते हैं। 15 दिनों से लेकर छह माह तक चलने वाले पाठ्‍यक्रमों की समाप्ति के बाद प्रशिक्षितों का एक स्वयं सहायता समूह बनाकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इसके अलावा आरोग्य भवन केंद्र से इस वर्ष से प्रबंधन पाठ्‍यक्रम की व्यवस्‍था उपलब्ध कराए जाने की कोशिश की जा रही है।

अशोक भगत कहते हैं कि राज्य में नक्सली समस्या कभी भी हमारे लिए बाधक नहीं बनी। हम जिस भावना के साथ कार्य करते हैं, उसके लिए किसी के साथ टकराहट की कोई गुंजाइश ही नहीं रहती। हमारा उद्देश्य निजी लाभ के लिए संसाधन जुटाना नहीं है। निजी हित से ऊपर उठकर जब भी कोई व्यक्ति, संस्था कार्य करेगी, किसी भी तरह की मुश्किलें उसका रास्ता नहीं रोकेंगी।
Published in Nai Dunia Magazine

एक शाम, हरिवंश के नाम

डा. विष्णु राजगढि़या
संस्मरण सुनाते हरिवंश

प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश को पढ़ना और सुनना यूं भी काफी दिलचस्प, प्रेरक और ज्ञानवर्द्धक होता है। वह भी जब विषय बिलकुल लीक से हटकर हो। यही कारण है कि सात जुलाई 2011 की शाम सात बजे विकास भारती में ‘एक शाम, हरिवंश के नाम‘ कार्यक्रम के लिए श्री अशोक भगत का बुलावा आया तो मैंने इसमें जाना जरूरी समझा।
श्री अशोक भगत ने इसमें अपने करीबी चुनिंदा सामाजिक कार्यकत्र्ताओं, अधिकारियों, बुद्धिजीवियों, नागरिकों को ही न्यौता था। यह कोई मीडिया इवेंट भी नहीं था। न छायाकारों की भीड़भाड़, न टीवी कैमरामैनों की आपाधापी। न ‘शहर में आज‘ स्तंभ में कोई सूचना, न कल के अखबार में कोई खबर। न मंच पर कोई कुरसी, न स्वागत, धन्यवाद और वक्तव्यों का सिलसिला। यहां तक कि खुद प्रभात खबर के सहकर्मी भी कार्यक्रम में नजर नहीं आये, जो हरिवंश जी के लिए यह आयोजन निहायत व्यक्तिगत और सादगीपूर्ण होने का एक और संकेत था। बगैर किसी औपचारिकता तत्काल विषय पर आने से पहले हरिवंश जी ने इस आयोजन के शीर्षक ‘एक शाम हरिवंश के नाम‘ को स्वप्रचार से दूर रहने के अपने स्वभाव के प्रतिकूल होने का बेहद विनम्र संकोच के साथ उल्लेख करते हुए उपस्थित प्रियजनों को सीधे संबोधित किया।
विषय भी कम दिलचस्प नहीं था - ‘कैलाश मानसरोवर यात्रा के संस्मरण‘। पिछले महीने चिन्मय मिशन के स्वामी माधवानंद जी के साथ कैलाश मानसरोवर परिक्रमा पर गयी टीम में हरिवंश भी शामिल थे। ऐसी किसी यात्रा से लौटकर कोई अपने संस्करण किस तरह सुनायेगा, इसकी कल्पना की जा सकती है। लेकिन वह व्यक्ति अगर हरिवंश हो, तो उन्हें जानने वालों के कौतूहल की मात्रा काफी अधिक होना स्वाभाविक है।
हरिवंश जी किसी भी विषय पर लिखने, बोलने या निर्णय लेने से पहले काफी पूर्व तैयारी, शोध और अध्ययन करते हैं। लेकिन ठीक यही चीज कैलाश मानसरोवर की यात्रा और इससे जुड़े संस्मरण सुनाने से दौरान भी करेंगे, ऐसा एहसास नहीं था।
संस्मरण की शुरूआत उन्होंने कैलाश मानसरोवर से जुड़े अपनी पूर्व धारणाओं और इससे संबंधित पुस्तकों के अध्ययन से हासिल जानकारियों के आधार पर की। विभिन्न लेखकों की पुस्तकों के अंश उद्धृत करते हुए उन्होंने बताया कि किस तरह यात्रा में जाने से पहले इनके अध्ययन के जरिये कैलाश मानसरोवर से जुड़े एक-एक पहलू की बारीकी से जानकारी हासिल करने का प्रयास किया। यात्रा की पृष्ठभूमि कैसे बनी, क्यों वह इसी वर्ष इस यात्रा के लिए उत्सुक थे, स्वामी माधवानंद के सहयोग से कैसे यह यात्रा संभव हो सकी और फिर किस तरह सहयात्रियों के साथ उन्होंने इस कष्टसाध्य यात्रा को हंसते-हंसते पूरा किया, इसका सारा विवरण। इसे सुनना जितना रोचक था, उतना ही ज्ञानवर्द्धक।
 यात्रा के दौरान हरिवंश ने अपने कैमरे से ढेर सारी तसवीरें भी लीं। बताया कि किस तरह पहली बार एक छायाकार की तरह फोटोग्राफी का आनंद लिया। इन तसवीरों को प्रोजेक्टर के माध्यम से बड़े परदे पर दिखाते हुए हरिवंश ने एक-एक मनोरम दृश्य का वर्णन करते हुए मानो पूरे कैलाश मानसरोवर को श्रोताओं के सामने साक्षात प्रस्तुत कर दिया। खुद किस तरह के दड़बेनुमा कमरों में रात गुजारते थे, इसकी भी तसवीरें। जिन यात्रियों के पास बेहतर साधन नहीं होते, वे किस तरह तंबूओं में रात गुजारते हैं, ऐसी तसवीरें लेना भी नहीं भूले हरिवंश। जाहिर है कि समाजवादी पृष्ठभूमि उन्हें इस दौरान भी हैव्स और हैव नोट का फर्क देखने की दृष्टि दे रही थी।
इस दौरान उन्होंने सहयात्रियों की कुछ समूह-तसवीरें भी दिखायीं। इन तसवीरों में हम हरिवंश को तलाशते हुए भूल चुके थे कि छायाकार तो खुद हरिवंश थे। श्रोताओं में बैठे स्वामी माधवानंद ने एक बार चुटकी लेते हुए कहा भी- इन तसवीरों में आपको हरिवंश नहीं मिलेंगे क्योंकि फोटो तो खुद हरिवंश ही उठा रहे हैं। हालांकि बाद की एक-दो तसवीरों में हरिवंश भी दिखे, अधपकी बढ़ी दाढ़ी और अदम्य ऊर्जा से दमकता खिलखिलाता चेहरा।
एक-एक पड़ाव से जुड़े रोचक प्रसंग, स्थानीय विशिष्टताओं का वर्णन और उनसे जुड़ी मान्यताओं पर अपना नजरिया। संस्मरण सुनते हुए हैरान था कि कैसे कोई आदमी किसी विषय पर इतने विस्तार से जाकर पढ़, सोच, देख सकता है और कैसे अपनी स्मृतियों का अंग बनाते हुए इतने सहज एवं रोचक तरीके से दूसरों को सुना सकता है। नेपाल के रास्ते चीन में प्रवेश के दौरान नेपाल-चीन सीमा पर घंटों किसी आम आदमी की तरह इंतजार और सुरक्षा जांच की उबाऊ प्रक्रिया से गुजरने का प्रसंग हो या फिर चीन द्वारा कैलाश मानसरोवर यात्रियों को कोई वीजा नहीं दिये जाने की वजहों का विवरण, खतरनाक रास्तों से गुजरने का रोमांच हो या फिर मामूली कमरों में बेहद कम सुविधाओं के साथ रात बिताने और शौचालय के अभाव में नित्य-क्रिया के लिए खुले मैदान में जाने जैसी स्थितियों को सहर्ष स्वीकारने जैसे प्रसंग काफी दिलचस्प रहे। एक रात किसी ने रजाई उठा ली और कड़कती ठंढ़ की रात गुजारने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था की मशक्कत हो, या फिर एक रात श्वांस संबंधी परेशानी आने के बावजूद सहयात्रियों की परेशानी का ध्यान रखते हुए चुपचाप सहन कर लेने से जुड़े अनुभव भी कम रोचक व प्रेरक नहीं थे। अध्ययनशीलता का ही नतीजा है कि एक रात बाहर निकलने से पहले उन्हें हिंसक कुत्तों से किसी खतरे के बोध ने सावधान किया। ब्रह्मपुत्र नदी से जुड़े प्रसंगों को अपनी पूर्व स्मृतियों से जोड़ते हुए भविष्य के खतरों से जोड़ते हुए चीन और भारत संबंधों की चर्चा करके हरिवंश ने जाहिर कर दिया कि ऐसी यात्राओं के क्रम में कितने विविध आयामों को देखा, समझा जा सकता है।
कैलाश मानसरोवर की यात्रा को धार्मिक एवं आध्यात्मिक पहलुओं से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन अपनी पृष्ठभूमि के अनुरूप हरिवंश ने इसे महज धार्मिक या आध्यात्मिक कर्मकांड के बजाय प्रकृति व सृष्टि की अद्भुत रचना और रहस्यों से जोड़कर देखते हुए इससे जुड़ी विविध मान्यताओं और अवधारणाओं पर विस्तार से चर्चा की। उन्हें एक अलग नजरिये से देखने और समझने की कोशिश करते हुए नये आयाम दिये। निश्चय ही इस संस्मरण के श्रोताओं को इन विषयों पर अलग तरीके से सोचने की दृष्टि मिली और संयोगवश भविष्य में किसी को ऐसी यात्रा का अवसर मिले तो वह एक बार उस नजरिये से देखने की कोशिश करेगा।
ऐसे किसी धार्मिक केंद्र की यात्रा से पहले जब दूसरे लोगों अपने मामूली या जरूरी सुविधाओं की चिंता करने और उन्हें सहेजने-समेटने की लाजिस्टिक चीजों तक अपनी सारी ऊर्जा केंद्रित रख छोड़ते हों, तब श्री हरिवंश का उस यात्रा से पहले ऐसा गहन अध्ययन-मनन करना और यात्रा के दौरान हरेक पहलू का ऐसा बारीक पर्यवेक्षण वाकई अनुकरणीय है। विकास भारती के सचिव श्री अशोक भगत को धन्यवाद, जिनके सौजन्य से इस सुखद प्रसंग का सहभागी होने का अवसर मिला।

Saturday, 9 July 2011

पंचायत चुनाव की दिशा में बढ़ा झारखंड

डा. विष्णु राजगढि़या

रांची: 11-04-10- झारखंड सरकार ने 30 जून से पहले पंचायत चुनाव कराने की घोषणा कर दी है। इससे राज्य में विकास के नये रास्ते खुलेंगे। बत्तीस साल से झारखंड में पंचायत चुनाव नहीं हुए हैं। इसके कारण ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय स्वशासन पूरी तरह ध्वस्त है। नयी पीढ़ी को पंचायती व्यवस्था के बारे में कुछ पता नहीं। पुरानी पीढ़ी भी इसके बारे में सब कुछ भूल चुकी है। अब पंचायत चुनाव के साथ ही सारी प्रक्रिया नये सिरे से शुरू होने की उम्मीद की जा रही है।
हालांकि पेसा कानून के तहत कराये जा रहे पंचायत चुनाव पर कुछ सदान नेताओं ने तीखी प्रतिक्रिया जाहिर की है। इससे पंचायत चुनाव में विध्न उत्पन्न होने की संभावना जतायी जा रही है। फिलहाल सरकार ने दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय देते हुए हर हाल में 30 जून से पहले पंचायत चुनाव कराने की घोषणा की है। इसके अलावा, जिन नगर निकायों के चुनाव अब तक नहीं कराये गये हैं, उनके चुनाव भी मई में कराने की तैयारी कर ली गयी है।
शुक्रवार को राज्य मंत्रिपरिषद की बैठक में पंचायत चुनाव को हरी झंडी दिखा दी गयी। राज्य के मुख्य सचिव डा. एके सिंह ने इसकी विधिवत घोषणा भी कर दी। राज्य निर्वाचन आयोग से मिली सूचना के अनुसार चार चरणों में चुनाव होंगे। जून के प्रथम सप्ताह से बीस जून तक चुनाव कराये जा सकते हैं। पंचायत राज्य सचिव संतोष कुमार सत्पथी के अनुसार पंचायत चुनाव कराने के लिए विभाग के पास 75 करोड़ की राशि उपलब्ध है। चुनाव ईवीएम मशीन से कराये जायेंगे। चुनाव में 45000 इवीएम की जरूरत होगी। चुनाव के लिए 74 हजार सुरक्षाकर्मियों की आवश्यकता का आकलन किया गया है। मुख्यमंत्री ने 19 अप्रैल को सभी उपायुक्तों की बैठक बुलायी है।
मालूम हो कि स्थानीय निकायों के चुनाव नहीं होने के कारण विगत दस वर्षों में झारखंड को लगभग 2200 करोड़ की केंद्रीय सहायता से वंचित होना पड़ा। इसके अलावा, ग्रामीण विकास एवं शहरी निकायों के कामकाज में जनभागीदारी के अभाव के कारण बिचैलियों की चांदी रही और योजनाओं में जमकर लूट हुई। अब पंचायत और नगर निकाय चुनाव से केंद्रीय सहायता मिलने और योजनाओं में लूटखसोट पर रोक लगने के रास्ते खुल जायेंगे।
पंचायत चुनाव में महिलाओं को पचास फीसदी सीटों पर आरक्षण मिलेगा। इसके लिए पंचायत चुनाव अधिनियम 2001 में जल्द ही संशोधन किया जायेगा। पेसा कानून के तहत पंचायत चुनाव होगा। राज्य के 260 में से 132 प्रखंड अनुसूचित जनजाति के लिए अधिसूचित हैं। इन 132 प्रखंडों में प्रमुख का पद अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित रहेगा। उपप्रमुख और मुखिया के पद अनारक्षित हैं। इसी तरह, अधिसूचित क्षेत्रों में मुखिया का पद अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित रहेगा। राज्य की 4562 पंचायतों में से 2071 पंचायतें अधिसूचित हैं।
पंचायत चुनाव में पेसा के पेंच को लेकर अब तक काफी विवाद रहा है। पहले भी राज्य सरकार ने पंचायत चुनाव की कोशिश की थी। अदालत में विभिन्न मुकदमों के कारण ऐसा संभव नहीं हो पा रहा था। बारह जनवरी को सर्वोच्च न्यायालय ने पेसा के तहत पंचायत चुनाव कराने का स्पष्ट निर्देश देकर सारी बाधाएं दूर कर दीं। पेसा के तहत अनुसूचित जनजाति को मिले आरक्षण पर कुछ सदान नेताओं ने आपत्ति करते हुए 13 अप्रैल को झारखंड बंद की घोषणा की है। सदान नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट एवं झारखंड हाईकोर्ट का भी दरवाजा खटखटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके कारण पंचायत चुनाव में विधि-व्यवस्था के संकट या अदालत के हस्तेक्षप के कारण बाधा उत्पन्न होने की संभावना कायम है। सत्ता का विकेंद्रीकरण करने की दिशा में सदान समुदाय का सहयोग मिलेगा तथा उनकी नाराजगी दूर हो जायेगी।
भूरिया कमेटी की अनुशंसा के आलोक में 1996 में पेसा कानून बना था। इसका पूरा नाम है- पंचायत राज विस्तार अधिनियम। देश के नौ राज्यों में पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत पेसा कानून लागू है। ये राज्य हैं- झारखंड, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश, ओडि़शा और गुजरात। इनमें झारखंड के सिवाय अन्य सभी राज्यों में पेसा के प्रावधानों के अंतर्गत पंचायत चुनाव कराये जा चुके हैं। ऐसे में सिर्फ झारखंड का पंचायत के बहुआयामी लाभों से वंचित रहना अनुचित है। लिहाजा, राज्य में पंचायत चुनाव की पहल का समाज के व्यापक हिस्सों ने स्वागत किया है और अगर सरकार इस बार चुनाव कराने में सफल होती है तो इसे राज्य की एक बड़ी उपलब्धि माना जायेगा।

जाति सत्यापन की भेंट चढ़े एसटी बेरोजगार

डा. विष्णु राजगढि़या
जुलियस एक्का
रांची: पांच राज्यों के 143 एससी-एसटी बेरोजगारों को जाति प्रमाणपत्र का सत्यापन नहीं हो पाने के कारण सरकारी नौकरी से हाथ धोना पड़ा। चार साल बीत जाने के बावजूद बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडि़शा और छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों के जिलाधिकारियों ने ऐसे बरोजगारों के जाति प्रमाणपत्र का सत्यापन करने की जरूरत नहीं समझी।
बीसीसीएल में डंफर आपरेटर के साक्षात्कार में सफल होने के बावजूद नौकरी से अब तक वंचित रांची के एक आदिवासी बेरोजगार जुलियस एक्का ने सूचना का अधिकार के जरिये इस सच्चाई को उजागर किया है।
नई दुनिया के पास इस बाबत मौजूद दस्तावेज बताते हैं कि बार-बार स्मरण कराने के बावजूद जिलाधिकारियों के कान में जूं तक नहीं रेंगी। कोल इंडिया ने वर्ष 2006 में अनुसूचित जाति एवं जनजाति के रिक्त पदों पर नियुक्ति के लिए विशेष अभियान चलाया था। इसके तहत बीसीसीएल ने कुल 187 पदों के लिए उम्मीदवारों का चयन कर लिया। इनमें अनुसूचित जाति के 108    तथा अनुसूचित जनजाति के 79 उम्मीदवार थे। ये बेरोजगार बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडि़शा और छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों के थे। इन उम्मीदवारों के जाति प्रमाणपत्र के सत्यापन के लिए संबंधित जिलाधिकारियों को भेजा गया। लेकिन सिर्फ 76 उम्मीदवारों के जाति प्रमाणपत्र का सत्यापन किया गया। शेष 111 बेरोजगारों के बारे में संबंधित जिलाधिकारियों ने कोई सूचना नहीं भेजी। इसके कारण ऐसे बेरोजगारों को हाथ लगी सरकारी नौकरी से वंचित होना पड़ा।
दस्तावेजों से पता चलता है कि बीसीसीएल ने चयन करने के बाद उम्मीदवारों को इसकी कोई सूचना नहीं दी। सिर्फ संबंधित जिलाधिकारियों को जाति प्रमाणपत्र के सत्यापन के लिए बार-बार पत्र भेजे जाते रहे। अगर चयनित बेरोजगारों को भी इसकी सूचना दी गयी होती तो वे अपने प्रयास से जाति प्रमाणपत्र का सत्यापन करा सकते थे।
रांची निवासी जुलियस एक्का का डंफर आपरेटर के बतौर चयन हुआ था। रांची जिला प्रशासन ने उसका जाति प्रमाणपत्र सत्यापित नहीं किया तो बीसीसीएल ने उसके चयन को अमान्य कर दिया। जुलियस एक्का को इसकी जानकारी मिली तो उसने रांची जिला उपायुक्त से आग्रह करके अपने जाति प्रमाणपत्र का सत्यापन कराकर बीसीसीएल को भेज दिया लेकिन बीसीसीएल ने कहा कि अब देर हो चुकी है तथा आपका चयन अमान्य किया जा चुका है। लेकिन जुलियस ने हार नहीं मानी। उसने सूचना के अधिकार के तहत बीसीसीएल एवं रांची जिला प्रशासन से विभिन्न सूचनाएं मांगी। इससे उसे कई महत्वपूर्ण दस्तावेज मिले। यह भी पता चला कि उसके जैसे 111 बेरोजगारों के साथ यही हादसा हो चुका है।
जुलियस का मामला केंद्रीय सूचना आयोग तक भी पहुंचा है। जुलियस ने अब भी उम्मीद नहीं हारी है। देखना है कि जिला प्रशासन की संवेदनहीनता के शिकार जुलियस तथा अन्य बेरोजगारों को न्याय मिल पायेगा अथवा नहीं।