Saturday, 9 July 2011

खुशहाली का पहला खाका

डा. विष्णु राजगढि़या
आर्थिक सलाहकारों की रिपोर्ट का लोकार्पण करते हुए मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा
दस साल के बाद झारखंड ने बदलाव की नयी राह तलाशने का प्रयास किया है। पहली बार राज्य के लिए पंचवर्षीय योजना बनाकर विकास का दीर्धकालीन खाका तैयार करने की कोशिश शुरू हुई है।
स्कूल और कालेज के सैकड़ों छात्र-छात्राओं ने 16 मई को राजधानी के बीएनआर होटल में मुख्यमंत्री और आला अधिकारियों के सामने अपनी समस्याएं बताकर अनगिनत सुझाव दिये। पहले दिन की इस चर्चा से उत्साहित मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा कहते हैं कि विभिन्न विषयों पर ऐसी ही चर्चा राज्य के बुद्धिजीवियों, नागरिकों, तकनीकी विशेषज्ञों के साथ करके हम राज्य को विकास की पटरी पर लाने की ठोस योजना बना रहे हैं।

झारखंड बनने के साढ़े दस बाद भी यह राज्य बदहाली और राजनीतिक अस्थिरता का शिकार बना हुआ है। इस दुखद परिणति का चरम यह है कि अलग झारखंड का आंदोलन करने वाले झामुमो के वारिस व उपमुख्यमंत्री हेमंत सोरेन खुलेआम कहते हैं कि झारखंड अलग राज्य नहीं बना होता और हम बिहार के ही हिस्से रहे होते तो ज्यादा अच्छा होता। बार-बार अल्पमत सरकारों के पतन, बार-बार राष्ट्रपति शासन और हर तरफ भ्रष्टाचार ने इस राज्य को एक नकारात्मक उदाहरण बना दिया है। पिछले साल हुए चुनाव में भी किसी को बहुमत नहीं मिलने, शिबू सोरेन के नेतृत्व में सरकार बनने और चार महीनां में गिर जाने, राष्ट्रपति शासन लगने और फिर अर्जुन मुंडा की सरकार बनने के कारण राज्य का ताना-बाना बुरी तरह बिखरा हुआ नजर आया। इसका लाभ उठाकर राज्य के अधिकांश हिस्सों में तरह-तरह की उग्रवादी और आपराधिक शक्तियों ने इस कदर अपना साम्राज्य कायम कर लिया कि बड़ी-बड़ी घटनाओं के बावजूद पुलिस-प्रशासन के आला अधिकारी चूं तक करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते।

इस निराशा के माहौल में वर्ष 2011 की शुरूआत में दो बड़ी सफलता ने नयी उम्मीदें जगायी थीं। पंचायत के चुनाव 32 वर्ष के बाद सफलता पूर्वक संपन्न होने और सात बार टलने के बाद नेशनल गेम के सफल आयोजन से ऐसा लगने लगा कि राज्य ने अब सही दिशा पकड़ ली है। लेकिन इसी बीच झारखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश भगवती प्रसाद द्वारा अतिक्रमण हटाने सबंधी निर्देश दिये जाने ने राज्य का माहौल एक बार फिर खराब कर दिया। इस निर्देश का अनुपालन कराने के लिए स्वयं मुख्य न्यायाधीश की सक्रियता और राज्य के विभिन्न हिस्सों में मौके पर जाकर मुआयना करने के कारण सरकार पर जबरदस्त दबाव पड़ा। अतिक्रमण हटाओ अभियान के खिलाफ केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय सड़कों पर उतर आये। पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी सात दिनों क अनशन पर बैठे। खुद भाजपा के दिग्गज नेता पूर्व केंद्रीय वि़त्तमंत्री यशवंत सिन्ही को धरने पर बैठना पड़ा। भाजपा विधायक व विधानसभा अध्यक्ष सीपी सिंह ने खुलेआम बागी तेवर अपना लिया।
जाहिर है कि यह दृश्य राज्य को एक बार फिर अंधेरी गली में धकेलने वाला दिखायी देता है।

लेकिन दिलचस्प है कि ऐसी जटिलताओं के बीच मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा राज्य के विकास का खाका खींचने में जुटे हैं। झारखंड विकास के लिए मुख्यमंत्री के आर्थिक सलाहकारों की रिपोर्ट से सरकार को काफी उम्मीदें हैं। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रो विवेक देबराय की अध्यक्षता में बनी इस तीन सदस्यीय समिति में लवीश भंडारी एवं विशाल सिंह शामिल हैं। मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा को इस रिपोर्ट से काफी उम्मीदें हैं। रिपोर्ट का लोकार्पण करते हुए उन्होंने झारखंड के लिए विकास के कारगर रास्ते की तलाश की बात कहकर दरअसल उस पीड़ा को अभिव्यक्त किया जो इस राज्य के हर नागरिक की जुबान पर है।

प्रो0 विवेक देबराय समिति ने झारखण्ड की स्थितियों, संभावनाओं एवं चुनौतियों को रेखांकित करते हुए 170 पृष्ठों की विस्तृत रिपार्ट दी है। इसमें राज्य के लिए विकास कार्यक्रमों का प्रारूप दिया गया है। रिपोर्ट में इन कार्यक्रमों के कार्यान्वयन पर विशेष सतर्कता बरतते हुए हरेक स्तर पर सहभागिता को जरूरी बताया गया है। इस रिपोर्ट में आर्थिक सलाहकारों ने झारखंड की कई विसंगतियों और जटिलताओं को चिन्हित करते हुए वैकल्पिक रास्ते सुझाये हैं।
स्कूल-कालेज के विद्यार्थियों से पंचवर्षीय योजना पर सुझाव लेते हुए मुख्यमंत्री

मुख्यमंत्री साफ शब्दों में स्वीकारते हैं कि झारखंड बनने के दस साल बीत जाने के बाद भी विकास को लेकर जटिलताएं मौजूद होने के कारण ऐसे नवगठित राज्य की प्राथमिकताएं तय करने में दिक्कतें आयी हैं। लेकिन हमें अपनी दीर्धकालिक योजना ऐसी बनानी है जिसके आधार पर बजट का निर्माण हो न कि हम बजट के आधार पर अपनी योजना बनाएं।
श्री मुंडा के अनुसार समिति ने आर्थिक अध्ययन के आधार पर विकास हेतु सुझाव दिये हैं ताकि राज्य अपना एक लक्ष्य लेकर आगे बढ़ सके। देश में प्रगति हुई है परंतु कई प्रकार की जटिलताएं भी स्वतः जन्म ले चुकी हैं। झारखण्ड में भी अनेक आन्तरिक समस्याएं हैं। इनका समाधान करते हुए ही विकास किया जा सकता है। इसके लिए आन्तरिक सुधार परम आवश्यक है ताकि विकास की किरणें समाज के अंतिम पायदान तक पहुँचे।
श्री मुण्डा के अनुसार लोकतंत्र में राजनीति से लोकनीति का स्थान सर्वोपरि है। इसलिए आवश्यकता आधारित जनोन्मुखी समेकित विकास के कार्यक्रमों पर गंभीर चिंतन आवश्यक है।
झारखण्ड राज्य के विशिष्ट सामाजिक-आर्थिक परिप्रेक्ष्य में सरकार चाहती है कि आम-अवाम की भागीदारी से हम राज्य के विकास का रोडमैप तैयार करें ताकि वर्ष 2025 तक की दीर्घकालिक एवं लघुकालिक योजनाओं का स्वरूप निर्धारित कर समयबद्ध दूरगामी परिणामोन्मुख कार्यान्वयन सुनिश्चित किया जाए।
इस क्रम में वैश्विक आर्थिक चुनौतियों के मद्देनजर झारखण्ड की आगामी दो पंचवर्षीय योजनाओं के लिए विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों, विद्वतजनों, संबंधित क्षेत्रों के लाभुकों एवं विशेषज्ञों के साथ चर्चा की। राज्य में लोक सहभागिता पर आधारित योजना परिप्रेक्ष्य  एवं योजना स्वरूप तय करने के लिए समाज के सभी-सभी क्षेत्रों के लोगांे के अनुभव, सोच, चिंतन को समेकित रूप से प्राप्त कर राज्य की दूरगामी परिणामोन्मुख आगामी दो पंचवर्षीय योजनाओं का आधार तय किया जाए।

आर्थिक मामलों के जानकार अयोध्यानाथ मिश्र के अनुसार इस कोशिश के जरिये मुख्यमंत्री इस धारणा को बदलना चाहते हैं कि विकास का कार्य सरकार द्वारा किया जाना है। इसके बदले वह विकास के लिए हर व्यक्ति की सहभागिता पर बल दे रहे हैं।

राज्य के मुख्य सचिव एस.के. चैधरी के अनुसार प्रो. देबराय कमिटी की रिपोर्ट में शार्ट, मिड एवं लांग टर्म इकानोमिक डेवलपमेंट प्रोग्राम दिया गया है । सरकार को  इन सुझावों को कार्यान्वित करना है । इसके कार्यान्वयन पर सभी को एक साथ कार्य करना होगा।

प्रो0 देबराय बताते हैं कि उन्होंने पूरे झारखण्ड का दौरा करके पाया कि झारखण्ड पूरे देश में सबसे तेज गति से विकसित होने वाला राज्य बन सकता है। यह विकास सिर्फ शहरी क्षेत्र में ही नहीं बल्कि ग्रामीण क्षेत्र में भी संभव है। औद्योगिक विकास के साथ-साथ झारखण्ड में कृषि एवं वन्य आधारित विकास की भी प्रचूर सम्भावना है।

आर्थिक सलाहकारों ने प्रथम चरण के अपने प्रतिवेदन में बदलते झारखण्ड के लिए सामाजिक-आर्थिक पहलूओं पर चर्चा की है। दूसरे चरण में केन्द्र राज्य संबंधौं, खासकर वित्तीय संबंधो, समरूप योजना उद्व्यय का निर्धारण एवं आर्थिक-सामाजिक पहलूओं पर समिति को रिपोर्ट सौंपना है। इसमें झारखण्ड राज्य के विशिष्ट भौगौलिक-प्राकृतिक आयामों का विशेष ध्यान रखते हुए राज्य के स्त्रोतों-संसाधनों का पर्यावरणीय दृष्टिकोण से सार्थक उपयोग करते हुए राज्य के विकास की संभावनाओं को रेखांकित किया जाना है।

राज्य की वर्षों से लंबित चल रही सिंचाई योजनाओं की स्थिति की चर्चा करते हुए रिपार्ट में कहा गया है कि दिनोंदिन इन परियोजनाओं की लागत में इजाफा हो रहा है और खेतों को आज तक सिंचाई की सुविधा नहीं मिल पाई है जो व्यापक चिंता का विषय है। अतएव स्थानीय उपलब्ध संसाधनों एवं स्थानीय प्राकृतिक परिस्थियों को ध्यान में रखते हुए लोक भागीदारी पर आधारित दीर्घ अवधि एवं कम अवधि की योजनाओं के कार्यान्वयन की जरूरत है ताकि आने वाले दस वर्षों के बाद भी इन योजनाओं की उपयोगिता हो एवं लक्षित समुदायों को ली गई योजनाओं का फायदा हो।

राज्य के सुदूर इलाकों में विकास की अलख जगाने में जुटे विकास भारती के सचिव अशोक भगत इन कोशिशों को काफी सकारात्मक मानते हुए कहते हैं कि पहली बार ऐसी कोशिश शुरू करके राज्य सरकार ने नागरिकों को विकास में सहभागी बनने का अवसर दिया है। पहली बार हुए पंचायत चुनाव के बाद यह अवसर भी है कि विकास की प्राथमिकताएं तय करने से लेकर उनके क्रियान्वयन और निगरानी तक में जनभागीदारी सुनिश्चित की जाये। सरकार अगर पंचायतों के नवनिर्वाचित प्रतिनिधियों की क्षमता का सदुपयोग कर सके तो राज्य के लिए नयी उम्मीदें जग सकती हंै।

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