डा. विष्णु राजगढि़या
![]() |
| नेमरा गांव में मुख्यमंत्री शिबू सोरेन |
इस गांव से झारखंड के गुरुजी को आज भी उतना ही लगाव है। कोई भी पारिवारिक कार्यक्रम अब भी यहीं होता है चाहे खुशी का अवसर हो या फिर गम का। ऐसे मौकों पर जब सैकड़ों कार्यकत्र्ताओं के साथ नेताओं, मंत्रियों, विधायकों, अधिकारियों का काफिला इस गांव पहुंचता है तो सबकी जुबान पर एक ही सवाल रहता है कि विकास की राह में आखिर नेमरा जैसे गांव इतने पीछे क्यों छूट गये।
शिबू सोरेन का पैत्रिक गांव नेमरा आज भी विकास से कोसों दूर है। रामगढ़ और बोकारो के औद्योगिक क्षेत्रों से घिरे और जंगलों, पहाड़ों के बीच बसे इस सुदूर गांव के लिए सड़क तक नहीं है। राजधानी से लगभग एक सौ किलोमीटर दूर इस गांव तक पहुंचने के लिए लगभग दस किलोमीटर कच्ची सड़क से गुजरना पड़ता है। उस कच्ची सड़क को इन दिनों पक्की किया जा रहा है। इसके कारण जगह-जगह खेतों से होकर डावयर्सन निकाला गया है। हालांकि यह काम भी एक साल से ज्यादा समय से चल रहा है। रामगढ़-बोकारो मार्ग में गोला प्रखंड मुख्यालय से लगभग 26 किलोमीटर अंदर है यह गांव है। हाल के दिनों में यहां के लोगों ने गांव के समीप जंगल और दो पहाडि़यों को चीरकर बोकारो की ओर जाने का एक बेहतर रास्ता ढूंढ़ निकाला है। श्रमदान के जरिये इसे बनाने की कोशिश की जा रही है।
रामगढ़ जिले के गोला प्रखंड का यह गांव हर तरह की बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। यहां यह गांव बंगाल से झारखंड में घुसने वाले माओवादी उग्रवादियों का रेड कारीडोर है। इस गांव में जंगली हाथी घुस आते हैं। इस बार जिस दिन शिबू सोरेन ने कुरसी संभाली, उस रात जंगली हाथी उनके खेत में घुस आये, फसल नष्ट की और घर की चहारदिवारी गिरा दी। यहां अक्सर जंगली सुअर भी घुस जाते हैं। इसके बावजूद अब भी शिबू सोरेन के परिजन इस गांव में रहकर विकास की बाट जोह रहे हैं। पहले उनके भाई शंकर सोरेन यहां की देखरेख करते थे। पिछले साल उनकी मृत्यु के बाद छोटे भाई लालू सोरेन ने यहां का जिम्मा संभाला।
ऐसे सुदूर गांव में जन्मे शिबू सोरेन को इस उंचाई तक पहुंचाने में इस गांव की बड़ी भूमिका है। वर्ष 1947 में मिली आजादी की कोई रोशनी इस गांव तक नहीं पहुंची थी और सूदखोरों, महाजनों का ही राज चलता था। थोड़े से कर्ज के एवज में आदिवासियों की पूरी फसल लूट ली जाती थी। इसके खिलाफ शिबू सोरेन के पिता सोबरन सोरेन ने अभियान चलाया तो वर्ष 1957 में पहाडि़यों के समीप उनकी हत्या कर दी गयी थी। शिबू सोरेन उस वक्त महज तेरह वर्ष के थे। उस घटना ने उनके भीतर महाजनी प्रथा के खिलाफ नफरत की ज्वाला पैदा कर दी। उन्होंने इसके खिलाफ आदिवासियों को गोलबंद करना शुरू किया और धनबाद के टुंडी इलाके को इसका केंद्र बनाया। नेमरा से उठी यह चिनगारी अंततः झारखंड अलग राज्य के रूप में सामने आयी।
![]() |
| नेमरा गांव में बेटे के विवाह समारोह में शिबू सोरेन |
गुरुजी के परिवार के कुलदेवता नेमरा में ही हैं। इस गांव में 115 संताल आदिवासी परिवार रहते हैं। मान्यता है कि संताल के सिवाय कोई भी अन्य आदिवासी अथवा दूसरी जाति का कोई भी यहां बसना चाहता है तो उसका वंश नहीं बढ़ता। इस गांव में आज भी सरकारी नौकरी करने वाला सिर्फ एक आदमी है। वह चतुर्थवर्गीय कर्मचारी है। ज्यादातर आदिवासी परिवारों में शिक्षा का घोर अभाव रहा है। लेकिन अब यहां आठवीं कक्षा तक का सरकारी स्कूल खुल गया है। आठवीं के बाद कुछ बच्चे पैदल अथवा साइकिल से गोला जाकर पढ़ाई कर रहे हैं। नयी दुनिया की टीम जब नेमरा गांव पहुंची तो साइकिल से आते कुछ स्कूली छात्र-छात्राओं को देखकर यह स्पष्ट हो रहा था कि नयी पीढ़ी में शिक्षा के प्रति जागरूकता आयी है।
शिबू सोरेन के पुत्र हेमंत सोरेन इस इलाके की बदहाली को झारखंड आंदोलन की अवधारणा के साथ जोड़कर देखते हैं। झामुमो विधायक दल नेता का दायित्व संभाल रहे हेमंत सोरेन के अनुसार अंग्रेजों की ही तरह आजादी के बाद की भी सरकारों ने सुदूर आदिवासी इलाकों को उपेक्षा का शिकार बनाये रखा। सबकी नजर सिर्फ आदिवासियों की जमीन और झारखंड के खनिजों पर रही। इसलिए नेमरा गांव इस बात का गवाह है कि अलग झारखंड राज्य की जरूरत क्यों पड़ी। अब हमारी कोशिश है ऐसे सुदूर इलाकों को विकास की ओर ले जाना।
हाल के दिनों में कई सरकारी योजनाओं का लाभ नेमरा तथा समीप के गांवों को मिला है। इस गांव तक पहुंचने के लिए दौरान जगह-जगह चल रहे सड़क निर्माण कार्य और जेसीबी मशीनों को देखकर पता इसका पता चलता है। छोटा-सा एक स्वास्थ्य केंद्र भी बन रहा है। नरेगा योजना के तहत साढ़े पांच लाख का एक तालाब बनाया गया है। यहां के निवासी मुख्यतः खेती पर निर्भर हैं लेकिन सिंचाई की कोई सुविधा नहीं है। फिलहाल एक चेक डैम और एक लिफ्ट एरिगेशन का इंतजाम हुआ है। लेकिन लालू सोरेन इसे नाकाफी मानते हैं। कहते हैं- ग्रामीणों का सुझाव है कि नेमरा की दो पहाडि़यों को बांधकर चेक डैम बना दिया जाये और बोकारो की ओर एक रास्ता निकाल दिया जाये तो पूरे इलाके का विकास हो सकता है। डैम से हाइडल प्रोजक्ट लगाकर बिजली पैदा की जा सकती है और डैम बनने से जंगली हाथियों का आना भी बंद हो सकता है।
कृषि और पशुपालन मंत्री मथुरा प्रसाद महतो भी नेमरा गांव को प्राथमिकता की सूची में शामिल किया है। वह ऐसे गांवों के किसानों और आदिवासियों के बीच स्वयं जाकर उनकी जरूरतों को समझने की कोशिश में जुटे हैं। श्री महतो के अनुसार मुख्यमंत्री किसान खुशहाली योजना का लाभ नेमरा तथा समीप के दो गांवों को दिया गया है। पांच सौ किसानों के बैंक खाते खोलकर प्रत्येक को 2500 रुपये की राशि दी गयी है ताकि वे अपनी आजीविका के लिए इसे पूंजी के बतौर उपयोग कर सकें। यहां दो कृषि मित्र बनाये गये हैं। उन्नत खेती के लिए दो पावर टीलर तथा दो पंप सेट दिये गये हैं। दो लिफ्ट एरिगेशन भी लगाये गये हैं। श्री महतो के अनुसार पशुपालन योजनाओं के तहत नेमरा तथा समीपवर्ती गांवों को सुअर पालन और मुर्गीपालन के लिए सुविधाएं दी गयी हैं। बकरी पालन के लिए भी जल्द ही सुविधाएं दी जायेंगी। सिंचाई के लिए तालाब और कुंओं की भी योजना है।
प्रखंड कृषि पदाधिकारी रमनीकांत सिंह इन योजनाओं को लेकर काफी उत्साहित हैं। उनका मानना है कि ऐसे क्षेत्रों में स्टेट बोरिंग के जरिये सिंचाई की व्यवस्था की जाये तो त्वरित विकास संभव है। प्रखंड पशुपालन पदाधिकारी डा. राजीव रंजन के अनुसार पशुपालन से इस इलाके के आदिवासी समुदाय को आजीविका के बेहतर साधन आसानी से उपलब्ध कराये जा सकते हैं। झामुमो के प्रखंड अध्यक्ष काली प्रसाद चक्रवर्ती के अनुसार नेमरा गांव ने झारखंड के इतिहास में बड़ा योगदान किया है और अब हमारा फर्ज है कि इसका कर्ज अदा करें। यहां सोबरन सोरेन का शहीद स्थल है जो हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत है।
सरकार और पदाधिकारियों की प्राथमिकता में आने के बाद नेमरा गांव और इस इलाके को विकास की एक नयी आशा दिखी है। देखना है कि नेमरा और ऐसे अन्य सुदूर गांवों के विकास में सरकार कितनी सफल हो पाती है।


No comments:
Post a Comment