Saturday, 9 July 2011

32 साल बाद पंचायत की उम्मीद

डा. विष्णु राजगढि़या
झारखंड में नयी पीढ़ी पंचायत का मतलब नहीं जानती। गांव के नौजवानों ने कभी सरपंच को नहीं देखा, मुखिया का नाम नहीं सुना। उन्हें नहीं मालूम कि भारत के संविधान में पंचायती राज की कैसी परिकल्पना की थी। महात्मा गांधी से लेकर राजीव गांधी तक पंचायतों को मजबूत करके गांव का राज ग्रामीणों को सौंपने की बातें भी उनके लिए बेमानी हैं।
कारण यह कि 1978 के बाद कभी झारखंड में पंचायत चुनाव हुए ही नहीं। वर्ष 2000 में बिहार से अलग होकर झारखंड बना। उसके बाद बिहार ने तो पंचायत चुनाव करा लिये, लेकिन झारखंड अब तक पंचायती राज के लिए तरस रहा है। झारखंड अलग राज्य बनने के बाद विभिन्न कानूनी विवादों के कारण पंचायत चुनाव टलता रहा। इसके कारण गावों को स्वशासन के अवसर से वंचित होना पड़ा है। ग्रामीण विकास की अरबों की केंद्रीय सहायता से भी हर साल वंचित होकर यह राज्य लगातार पिछड़ने के लिए बाध्य रहा है। स्थानीय नेतृत्व के अभाव ने ग्रामीण युवाओं को उग्रवादी संगठनों के प्रभाव में आसानी से छोड़ देने का भी रास्ता बना रखा है।
भाजपा सांसद एवं राष्ट्रीय महासचिव अर्जुन मुंडा झारखंड में जल्द-से-जल्द पुचायती चुनाव कराना जरूरी मानते हैं। कहते हैं- महात्मा गांधी ने ग्राम स्वराज का सपना देखा था। पंचायती राज उनका सपना था। उनका स्पष्ट मानना था कि सच्चा लोकतंत्र वह नहीं है जिसमें महज बीस लोग दिल्ली में बैठकर शासन चलाएं। सच्चा लोकतंत्र तो नीचे से, हर गांव में लोगों के द्वारा चलाया जाने पर ही आयेगा। अब झारखंड को पंचायती राज की उम्मीद जगी है। राज्य सरकार इन दिनों पंचायती चुनाव की तैयारियों में जी-जान से जुटी है। गत दिनों राज्य के नये मुख्य सचिव डा अशोक कुमार सिंह ने 30 जून से पहले राज्य में पंचायत चुनाव करा लेने की घोषणा करके राज्य में राजनीतिक एवं सामाजिक हलचल तेज कर दी है। हालांकि पेसा कानून के तहत चुनाव कराने के खिलाफ सदान एवं कुरमी समुदाय के तीखे तेवर के कारण किसी भी वक्त खटाई पड़ने की भी आशंका है। अगर कोई अनहोनी नहीं हुई और चुनाव कराये जा सके, तो इसे झारखंड के लिए एक ऐतिहासिक कदम माना जायेगा।

पंचायत चुनाव कराना आज झारखंड की प्राथमिकता बन चुकी है। इसके लिए राज्य में एक सकारात्मक संवाद का माहौल बनाना जरूरी है। संयोगवश माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस संबंध में स्पष्ट फैसला सुनाकर सारे गतिरोध समाप्त कर दिये हैं।
अब पेसा कानून के तहत राज्य में चुनाव कराने का रास्ता साफ हो गया है। हालांकि पेसा कानून और पंचायती व्यवस्था के विभिन्न प्रावधानों को लेकर जनता के विभिन्न हिस्सों में कई तरह के सवाल मौजूद हैं। सदान एवं कुरमी समुदाय के आंदोलन का नेतृत्व कर रहे पूर्व मंत्री लालचंद महतो के अनुसार का कहना है कि जिन प्रखंडों में आदिवासियों की संख्या नगण्य है, वैसे प्रखंडों में भी मुखिया का पद आदिवासी समुदाय के लिए आरक्षित कर दिया गया है। इस प्रावधान के खिलाफ सदान संगठनों ने 13 अप्रैल को झारखंड बंद कराया और अब आर्थिक नाकेबंदी की जा रही है। इसके बावजूद राज्य सरकार समय पर पंचायत चुनाव कराने के लिए आशान्वित है।

दूसरी ओर, कांग्रेस विधायक दल के नेता राजेंद्र प्रसाद सिंह का मानना है कि राज्य में पंचायत चुनाव तत्काल कराने के लिए विपक्ष हर संभव सकारात्मक मदद करने के लिए तैयार है जबकि स्वयं राज्य सरकार में ही गंभीरता का अभाव है। श्री सिंह के अनुसार इस बेमेल सरकार में किसी भी विषय पर वैचारिक एकता नहीं बन पायी है और पंचायत चुनाव को लेकर सरकार में इच्छाशक्ति का अभाव स्पष्ट तौर पर दिखायी दे रहा है। झारखंड विकास मोरचा के महासचिव प्रदीप यादव के अनुसार राज्य सरकार की मंशा पंचायत चुनाव कराने की नहीं बल्कि महज जनता की आंखों में धूल झोंकने की है।

हालांकि झारखंड और आदिवासी समुदाय के संदर्भ में बात करें तो यहां तो काफी पहले से ही स्वशासन की अनूठी और शानदार परंपरा रही है। आदिवासियों की परंपरागत शासन-प्रणाली में वह सब कुछ था जिसकी परिकल्पना आधुनिक पंचायती राज में की जाती है। झारखंड के वीर शहीदों सिद्धू कानू, चांद-भैरव, तिलका मांझी और बिरसा मुंडा ने आदिवासी स्वशासन की रक्षा करने के लिए अंग्रेजी शासन के खिलाफ ऐतिहासिक संघर्ष किये। अंग्रेजों को भी आदिवासी समुदाय की स्वायत्त शासन प्रणाली और आत्मनिर्भर ग्रामीण व्यवस्था, मुंडा मानकी प्रणाली और ग्राम प्रधान जैसी परंपराओं से खतरा महसूस हो रहा था। इसीलिए उन्होंने आदिवासी स्वशासन व्यवस्था को नष्ट करने की हर संभव कोशिश की।
राज्य के कृषि मंत्री मथुरा प्रसाद महतो का मानना है कि देश को आजादी मिलने के बाद गांवों में सत्ता को केंद्रित करने और पंचवर्षीय योजनाओं को लागू करने के लिए पंचायती राज की व्यवस्था हुई। उस वक्त उम्मीद की जाती थी कि झारखंड को स्वायत्तता मिलेगी और यहां के लोगों को अपना राज खुद चलाने का अधिकार होगा। लेकिन दुर्भाग्यवश बिहार की राजधानी पटना से केंद्रित शासन ने कभी झारखंड और झारखंडवासियों के हितों को प्राथमिकता नहीं दी। यही कारण है कि झारखंड अलग राज्य के लिए लंबा संघर्ष चला।
आजादी के बाद से वर्ष 2000 तक बिहार के साथ जुड़े रहने के कारण झारखंड जहां एक ओर स्वशासन के अवसर से वंचित रहा, वहीं बिहार में 22 वर्षों तक पंचायत चुनाव नहीं होने के कारण राज्य में पंचायती राज का अस्तित्व ही समाप्त हो गया। पहले अंग्रेजों ने झारखंड की परंपरागत पंचायत प्रणाली को नष्ट किया, फिर बिहार के समय में रही-सही कसर पूरी हो गयी।
आदिवासी बहुल इलाकों में इस आबादी के हितों की रक्षा के लिए 15 साल पहले पेसा कानून बना था। इस कानून के तहत देश के कई राज्यों में पंचायत चुनाव कराये जा चुके हैं। छत्तीसगढ़, ओडि़सा, मध्य-प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, हिमाचल प्रदेश और आंध्र प्रदेश में पेसा अधिनियम के तहत पंचायत के चुनाव हो गए। एकमात्र झारखंड ही ऐसा राज्य है जहां अब तक पंचायत चुनाव नहीं हो सका है।
झारखंड एकलौता राज्य हैं जहाँ पंचायती राज संस्थाएं है ही नहीं और जहाँ अनुसूचित क्षेत्र होने के बावजूद पेसा अधिनियम, 1996 अब तक कार्यान्वित नहीं हुआ है। झारखंड बनने के बाद झारखंड पंचायती राज अधिनियम 2001 बना। लेकिन इसमें पेसा के कई महत्वपूर्ण प्रावधानों की अनदेखी कर दी गयी। इसके कारण इसका काफी विरोध हुआ।
पेसा कानून में पंचायती राज के तीनों स्त्तरों में अनुसूचित जनजाति को शत् प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान है। लेकिन झारखंड उच्च न्यायालय ने वर्ष 2005 में एक याचिका पर फैसले के दौरान इस प्रावधान को स्थगित कर दिया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले के जरिए झारखंड में पंचायत चुनाव का रास्ता साफ कर दिया है।
राज्य में पंचायत चुनाव जल्द कराने को लेकर जागरूकता अभियान चला रहे मंथन युवा संस्थान के समन्वयक सुधीर पाल कहते हैं- पंचायत चुनाव होने से झारखंड के गांवों से लगभग 50 हजार जनप्रतिनिधि चुने जाएंगे जो राज्य की राजनीति को सशक्त करते हुए विकासशील और आत्मनिभर झारखंड की बुनियाद रखेंगे। पंचायती राज होने से नौकरशाही के जंजाल से झारखंड की जनता को राहत पाने का नया अवसर मिलेगा।

इसी अभियान से जुड़े सामाजिक कार्यकत्र्ता एवं सुप्रीम कोर्ट के आयुक्त के राज्य सलाहकार बलराम के अनुसार पंचायती चुनाव होने से हर प्रकार की केन्द्रीय सहायता तथा कार्यक्रमों का लाभ झारखंड को मिलने लगेगा। पंचायत चुनाव नहीं होने से अब तक झारखंड जिन योजनाओं से वंचित रहता था, उनका लाभ हम उठा सकेंगे। इससे 13वें वित्त आयोग की अनुशंसा के आलोक में विकास निधि में और इजाफा होगा। सबसे बड़ी बात है कि पंचायत चुनाव होने से दलित, आदिवासी और महिलाओं की स्थानीय स्वशासन में भागीदारी होगी।
पंचायत चुनावों को लेकर राजनीतिक दल और सामाजिक दलों के बीच चाहे जितने भी विवाद हों, गांवों और खास कर नौजवानों में जबरदस्त उत्साह देखा जा रहा है उन्हें उम्मीद है कि इस बार उन्हें अपने गांवों का राज अपने हाथ में लेने का अवसर मिलेगा।

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