रांची: झारखंड में एक बार फिर राष्ट्रपति शासन के दौरान तबादलों को लेकर राजनीति गरम होने लगी है। वर्ष 2009 में लगभग 11 महीनों तक चले राष्ट्रपति शासन के दौरान विपक्ष ने तबादलों एवं पदस्थापना में भ्रष्टाचार व मनमानी के गंभीर आरोप लगाये थे। उस दौरान यह भी कहा जा रहा था कि एक राजनीतिक दल विशेष को चुनावी लाभ पहुंचाने और पुलिस-प्रशासनिक मशीनरी का दुरुपयोग करने की मंशा से लगातार तबादले किये जा रहे हैं।
वर्ष 2009 के अंतिम सप्ताह में झारखंड में शिबू सोरेन के नेतृत्व में सरकार बनी। शिबू सरकार में भी तबादलों को लेकर सवाल उठते रहे। लेकिन शिबू सोरेन के इस्तीफे के बाद राष्ट्रपति शासन में अचानक ट्रांसफर और पोस्टिंग का सिलसिला काफी तेज हो गया। थोक के भाव में होने वाली ट्रांसफर-पोस्टिंग को उद्योग का दरजा देते हुए विपक्ष ने आड़े हाथ लिया है। इससे राजभवन की गरिमा पर भी सवालिया निशान लगे हैं।
भाजपा के अनुसार शिबू सरकार ने बेहद जरूरी होने पर ही तबादले किये जबकि राष्ट्रपति शासन में इसे एक धंधा बना लिया गया है। चर्चा है कि शिबू सरकार ने चार महीने में जितने तबादले किये, उससे ज्यादा तबादले गवर्नर राज के 15 दिनों के भीतर कर डाले गये। श्नागरिकों को यह जानने का हक है कि आखिर किसके दबाव में इतने बड़े पैमाने पर तबादलों को अंजाम दिया जा रहा है। झामुमो का मानना है कि गुरुजी ने अपने कार्यकाल में सिर्फ बेहद आवश्यक होने पर ही तथा प्रशासनिक वजहों से तबादले किये जबकि वर्तमान समय में होने वाले तबादलों को लेकर आम नागरिकों में भी हैरानी है।
लगातार जारी तबादलों के बीच कई विवाद भी सामने आये हैं। यहा तक कि इन विवादों के कारण एक वरिष्ठ आइएएस अधिकारी को खमियाजा भी भुगतना पड़ा है। गत दिनों भूमि एवं राजस्व विभाग में अंचल अधिकारियों का बड़े स्तर पर तबादला हुआ। बाद में दो अंचल अधिकारियों के तबादले पर रोक लगा दी गयी। इसके बाद विभागीय सचिव विष्णु कुमार को ही बदल दिया गया। साथ ही दो अंचल अधिकारियों का तबादला रोकने के मामले में उनसे कारण भी पूछा गया है। चर्चा है कि एक बड़े नेता के दबाव में दोनों अंचल अधिकारियों का तबादला रोका गया था। बाद में राजभवन के कोप का शिकार विभागीय सचिव को होना पड़ा। इस क्रम में कांग्रेस की आंतरिक कलह भी सामने आयी है।
झारखंड के गठन के साढ़े नौ वर्षों में विकास की गति अत्यधिक धीमी होने की एक बड़ी वजह प्रशासनिक अस्थिरता को भी माना जा रहा है। राजनीतिक अस्थिरता के कारण पुलिस-प्रशासनिक पदाधिकारियों को भी लगातार अस्थिरता का शिकार होना पड़ा है। महत्वपूर्ण विभागों के सचिव हर दो-चार महीनों में बदल दिये जाते हैं। अधिकांश जिलों और विभागों के प्रमुख पदों पर शायद ही कोई अधिकारी साल भर टिक पाता हो। कुछ जगहों पर तो एक साल में चार-चार अधिकारी बदले जाने का भी रिकार्ड है। ऐसे तबादलों के पीछे राजनीतिक कारणों के साथ ही भ्रष्टाचार के भी गंभीर आरोप लगते रहे हैं। कुछ जिलों के डीसी व एसपी के पदों तथा बड़ी संख्या में थानों के लिए खुलेआम बोली लगने के भी किस्से सामने आते रहे हैं। राष्ट्रपति शासन के पिछले तथा मौजूदा दौर में होने वाले अनगनित तबादलों का औचित्य स्पष्ट नहीं होने के कारण विपक्ष को आरोप लगाने का अवसर मिल रहा है।
हालांकि कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता राधाकृष्ण ने इन आलोचनाओं को अनावश्यक करार देते हुए कहा कि प्रशासनिक कारणों से आवश्यक होने पर ही तबादले किये जा रहे हैं।
दूसरी ओर, पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने भी इस मामले पर कड़े तेवर अपनाकर स्पष्ट कर दिया है कि तबादलों को लेकर राजनीति जारी रहेगी।

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