Saturday, 9 July 2011

जाति सत्यापन की भेंट चढ़े एसटी बेरोजगार

डा. विष्णु राजगढि़या
जुलियस एक्का
रांची: पांच राज्यों के 143 एससी-एसटी बेरोजगारों को जाति प्रमाणपत्र का सत्यापन नहीं हो पाने के कारण सरकारी नौकरी से हाथ धोना पड़ा। चार साल बीत जाने के बावजूद बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडि़शा और छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों के जिलाधिकारियों ने ऐसे बरोजगारों के जाति प्रमाणपत्र का सत्यापन करने की जरूरत नहीं समझी।
बीसीसीएल में डंफर आपरेटर के साक्षात्कार में सफल होने के बावजूद नौकरी से अब तक वंचित रांची के एक आदिवासी बेरोजगार जुलियस एक्का ने सूचना का अधिकार के जरिये इस सच्चाई को उजागर किया है।
नई दुनिया के पास इस बाबत मौजूद दस्तावेज बताते हैं कि बार-बार स्मरण कराने के बावजूद जिलाधिकारियों के कान में जूं तक नहीं रेंगी। कोल इंडिया ने वर्ष 2006 में अनुसूचित जाति एवं जनजाति के रिक्त पदों पर नियुक्ति के लिए विशेष अभियान चलाया था। इसके तहत बीसीसीएल ने कुल 187 पदों के लिए उम्मीदवारों का चयन कर लिया। इनमें अनुसूचित जाति के 108    तथा अनुसूचित जनजाति के 79 उम्मीदवार थे। ये बेरोजगार बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडि़शा और छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों के थे। इन उम्मीदवारों के जाति प्रमाणपत्र के सत्यापन के लिए संबंधित जिलाधिकारियों को भेजा गया। लेकिन सिर्फ 76 उम्मीदवारों के जाति प्रमाणपत्र का सत्यापन किया गया। शेष 111 बेरोजगारों के बारे में संबंधित जिलाधिकारियों ने कोई सूचना नहीं भेजी। इसके कारण ऐसे बेरोजगारों को हाथ लगी सरकारी नौकरी से वंचित होना पड़ा।
दस्तावेजों से पता चलता है कि बीसीसीएल ने चयन करने के बाद उम्मीदवारों को इसकी कोई सूचना नहीं दी। सिर्फ संबंधित जिलाधिकारियों को जाति प्रमाणपत्र के सत्यापन के लिए बार-बार पत्र भेजे जाते रहे। अगर चयनित बेरोजगारों को भी इसकी सूचना दी गयी होती तो वे अपने प्रयास से जाति प्रमाणपत्र का सत्यापन करा सकते थे।
रांची निवासी जुलियस एक्का का डंफर आपरेटर के बतौर चयन हुआ था। रांची जिला प्रशासन ने उसका जाति प्रमाणपत्र सत्यापित नहीं किया तो बीसीसीएल ने उसके चयन को अमान्य कर दिया। जुलियस एक्का को इसकी जानकारी मिली तो उसने रांची जिला उपायुक्त से आग्रह करके अपने जाति प्रमाणपत्र का सत्यापन कराकर बीसीसीएल को भेज दिया लेकिन बीसीसीएल ने कहा कि अब देर हो चुकी है तथा आपका चयन अमान्य किया जा चुका है। लेकिन जुलियस ने हार नहीं मानी। उसने सूचना के अधिकार के तहत बीसीसीएल एवं रांची जिला प्रशासन से विभिन्न सूचनाएं मांगी। इससे उसे कई महत्वपूर्ण दस्तावेज मिले। यह भी पता चला कि उसके जैसे 111 बेरोजगारों के साथ यही हादसा हो चुका है।
जुलियस का मामला केंद्रीय सूचना आयोग तक भी पहुंचा है। जुलियस ने अब भी उम्मीद नहीं हारी है। देखना है कि जिला प्रशासन की संवेदनहीनता के शिकार जुलियस तथा अन्य बेरोजगारों को न्याय मिल पायेगा अथवा नहीं।

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