Sunday, 10 July 2011

बदल रहे हैं, गांव, देहात और जंगल

हरिवंश  
 फ़रवरी 2008 में चतरा के नक्सल दृष्टि से सुपर सेंसिटिव गांवों में जाना हुआ. साथ के मित्रों के भय और आशंका के बीच, देर शाम तक घूमना हुआ. सूनी सड़कों पर मरघट की खामोशी के बीच. तब तक लिखा यह अनुभव भी छपा नहीं. पाठक पढ़ते समय ध्यान रखें यह फ़रवरी 2008 में लिखी गयी रपट है.

कभी डालटनगंज-चतरा के इन इलाकों में खूब घूमना हुआ. समाजवादी चिंतक, अब बौद्ध अध्येता व दार्शनिक कृष्णनाथजी से सुना था. कैसे लोग पत्तों को खाकर जीवन गुजारते थे? रंका में वह खुद छह माह रहे. भूख के खिलाफ़ लड़ाई में शिरकत की. जेल गये. कृष्णनाथजी से बनारस पढ़ने के दौरान मिलना हुआ. उनके व्यक्तित्व, लेखन ने असर डाला. उनका स्नेह मिला. वह कितनी ऊंचाई पर गये? आज कितने लोगों को वह याद हैं? उन पर फ़िर कभी. फ़िर रांची प्रभात खबर आना हुआ. और साबका हुआ, 1991-92 के अकाल से. प्रभात खबर, रांची के कुछ साथी, डालटनगंज के साथी, सब मिल कर सक्रिय हुए. त्रिदिव घोष, फ़ैसल अनुराग, डॉ सिद्धार्थ मुखर्जी, कर्नल बख्शी, गोकुल बसंत वगैरह के अनथक परिश्रम, प्रतिबद्धता और हर इलाके में भ्रमण से, अकाल मुद्दा बना. राहत पहुंचायी गयी. 

तब पहली बार उस इलाके में जाना हुआ. फ़िर झारखंड बनने के बाद पड़े अकाल के दौरान. 2002-2003 के बीच. कुसमाटाड़ (डालटनगंज) में जीन द्रेज के साथ जन सुनवाई क्रम में पांकी ब्लॉक भ्रमण. तत्कालीन झारखंड सरकार की आवाज दबाने की हर मुमकिन कोशिश!इस चतरा यात्रा (फ़रवरी ’08) के दौरान ये सभी पुराने अनुभव याद आये. बगरा मोड़ पहुंचते-पहुंचते तीन बज गये. वहां से प्रभात खबर से जुड़े साथियों के साथ लावालौंग के अंदरूनी गांवों में जाना हुआ. पुलिस की शब्दावली में‘सुपर सेंसिटिव’एरिया.
सड़क सूनसान थी. पक्की सड़क से उतर, कच्ची सड़क पर यात्रा शुरू हुई. सूचना मिली कि इन जगहों पर बरसों से लैंड माइन बिछी हैं. पुलिस-प्रशासन दूर ही रहना चाहते हैं. पहले एमसीसी गुट का अघोषित राज था. अब अंदरुनी अंतर्विरोध से टीपीसी जन्मा है. ताकतवर और चुनौती देनेवाला. कहते हैं, इन इलाकों में अब एमसीसी का भय घटा है. टीपीसी का दबदबा बढ़ा है.

सिमरिया उपचुनाव में टीपीसी समर्थित प्रत्याशी चुनाव में उतरी थीं. चूड़ी चुनाव चि: था. सबसे अधिक वोट इस इलाके से मिले, टीपीसी समर्थित प्रत्याशी को. बदल रहे हैं, गांव..लावालौंग से सटे गांव, कच्ची, टूटी-फ़ूटी सड़कों से जुड़े हैं. आज तक बिजली नहीं पहुंची है. उप स्वास्थ्य केंद्र कभी कभार खुलता है.
1995 में प्रखंड बना. बीडीओ नहीं बैठते. कार्यालय भवन बन रहा है. पड़ोसी प्रखंड कुंदा है. कहते हैं, एमसीसी का जन्म स्थल ये दोनों प्रखंड हैं. यहीं का घी, बांस, खैर लकड़ी और बेशकीमती जंगली लकड़ियां मशहूर थीं. लावालौंग चौक से तकरीबन 10 किमी दूर एक गांव में जलील खां मिले. कहा. 15 साल से दौड़ रहा हूं. गांव में चापानल या कुआं के लिए? पर आवेदन मैं देता हूं, काम आवंटन कहीं और होता है.
पीने के पानी के लिए नदी जाना पड़ता है. इसी गांव के राज गंझू इंटर पढ़े हैं. नौकरी की तलाश में हैं. संजीत केशरी आइएससी करके बैठे हैं. विकास भारती के अशोक भगतजी की सुनाई एक नागपुरी कहावत याद आती है. ढेर पढ़ले घर छोड़ले कम पढ़ले हर छोड़ले.बुंदेली कहावत भी है, कम पढ़े थे, हर से गये, अधिक पढ़े घर से गये.
भाषा-बोली कोई भी हो, यह भाव-चिंता हर जगह है. शिक्षा व्यवस्था कुछ ऐसी है कि युवकों को न घर का रहने देती है, न घाट का. पढ़े लिखे युवक बेकार बैठे हैं. यह बोझ कोई समाज ढो सकता है? पर गांवों की कथा-व्यथा यही है. बगल के हुटरू गांव में गाय-गो के लिए भी पानी नहीं. कपड़ा धोने के लिए इधर-उधर दौड़ते हैं. पर गांव की बच्चियां स्कूल जा रही हैं.
कुछेक साइकिल की प्रतीक्षा में भी हैं. सरकार से साइकिल मिलने की योजना चर्चित रही है.यहां एक लड़की ने साइकिल मांगी. उसका साहस देख प्रभावित हूं. आगे बढ़ने की ललक है. हक मांगने का आत्मविश्वास. पीने के पानी का संकट है. सड़क नहीं है. बिजली नहीं है. गांव में कुआं कोई और खुदवाता है, कमीशन लेता है. पढ़ कर दो लड़के बैठे हैं. इनमें से एक अंधा बच्चा भी है.

उसकी मां कह रही थी. लोकतंत्र ने बेजुबानों को बोलने की आवाज दी है. इन इलाकों को देखते हुए लगता है. सरकारी योजनाओं ने लोगों को पराश्रयी बना दिया है. उनकी निजी पहल, हुनर-उद्यम खत्म हो गये. चीन ने मछली देकर भूख शांत नहीं की, मछली मारना सिखा कर हुनर दिया. भूख मिटाने का. भारत ने परनिर्भर बनाया. हर चीज के लिए सरकार की ओर आंख. आत्मस्वभिमान खत्म. याद आते हैं.

बचपन के दिन. पीएल 480 ( अमेरिकी सहायता) के तहत विदेशी गेहूं गांवों में बंटता था. राहत के लिए. जल्द कोई लेना नहीं चाहता था. गरीब लोग भी कहते, पहले मुसमात (विधवा), लाचार, बूढ़ों और अनाथ लोगों को दें. 1991-92 के आसपास पलामू अकाल के दिनों में भी ऐसा अनुभव हुआ. बुंडू-खूंटी के कुछेक गावों में लोगों ने राहत लेने से मना कर दिया. कहा, मुफ्त चीज नहीं लेंगे.

भारतीय समाज में श्रम-स्वाभिमान की यह धारा थी. अब हालात बदल गये हैं. समाज को भी मुफ्तखोरी की आदत पड़ गयी है. लोभ-लालच का दौर है. बिना श्रम, अर्जन की भूख. सरकारी विकास संस्कृति और भ्रष्टाचार ने हमें कहां पहुंचा दिया है? इसी प्रखंड में मुलाकात हुई, लुखरी बिरहोरिन से. कहती हैं, एको लुर ढंग का घर नहीं है.

लुर शब्द सुनते ही मित्र मनोज प्रसाद याद आते हैं. वह बार-बार कहते हैं, हमारे शासकों में लुर का अभाव है. यहां बिरहोरों के लिए सरकारी घर बने हैं. टूटे-फ़ूटे, अधूरे और कमरों में अंधकार. प्रकृति के बीच खुले जीनेवालों को यह रास नहीं आ रहा. रघु बिरहोर की शिकायत है कि अब खरहा सिरा (खत्म) गया. चटाई कम बिकता है. घर चूते हैं. छत गिरती है. कहते हैं. पहले पत्ता के घर में रहते थे. वह ठीक था. जीतन बिरहोर की दोनों आंखें खराब हैं. देख नहीं पाते. 10-15 वर्षो से. कहते हैं, यहां सरकारी इंदिरा आवास में ठंड है.
पत्ता घर में ठंड नहीं थी. दो बेटे हैं. कमाने बाहर गये. आज तक नहीं लौटे. पुराने दिन याद करते हैं. जंगल सिरा गया. पहले खरहा, तितिर, मुरगा-मुरगी, खाते थे. 80 के ऊपर के हैं, पर उम्र पूछने पर कहते हैं, का पता 40-45 वर्ष होइ. आज तक किसी को वोट नहीं दिया है. दरअसल बिरहोरों के लिए बड़ा बदलाव है. हजारों वर्ष से जिस जंगल में रैन बसेरा था. घूमंतू जीवन था. शिकार व्यसन था. अब वह दुनिया खत्म हो चुकी है.
पर उनका मन वहीं अटका है. ‘सरकार-शासन’, ऐसे घूमंतू लोगों के इस संक्रमण दौर में ‘मिडवाइफ़’ की भूमिका में होते, तो यह शहरी बदलाव उन्हें पीड़ा नहीं देता. सहज, सपाट और आसान होता जीवन बदलाव. पर यह परिवर्तन रोका भी नहीं जा सकता, क्योंकि मानव समाज के मूल में टेक्नोलॉजी और बाजार की भूमिका निर्णायक है.

बदलाव पीड़ादायक होता है, पर इसी पीड़ा और दुख से तप कर ही मानव समाज पत्थर युग से यहां पहुंचा है. और ये इलाके भी बदल रहे हैं. मोबाइल फ़ोन ने इन जंगल के गांवों को भी एक सूत्र में बांधा है. शायद यही कारण है कि आधुनिकता के इन प्रतीकों को नक्सली ढाह रहे हैं. हाल में नक्सली समूहों ने पांच-छह टेलीफ़ोन टावर उड़ा दिये हैं. मोबाइल की तरह सड़कों ने भी सूरत बदली है. आवागमन और संपर्क ने सीमित दुनिया का ताना-बाना तोड़ा है.
लोगों का बाहर आना-जाना महज यात्रा नहीं होती. विचारों, बदलावों के बयार भी इन यात्रियों के साथ गांव लौटते हैं. टीवी ने दुनिया को घरों-गांवों में समेट दिया है. भोग और बेहतर जीवन की भूख की आंधी गांवों में भी बह रही है. यह उपभोक्तावाद की हवा है. बाजार भी इस बदलाव का कड़ा कारक है. इस जंगल में बसे, इन गांवों-हाटों में चाउमीन, पापकॉर्न वगैरह धड़ल्ले से मिलते हैं.
सरकारी स्कूलों में पढ़ाई हो या न हो, छात्र-छात्राएं पंक्तिबद्ध होकर जाते हैं. बैंकों में ऋण लेकर निजी रोजगार-कारोबार के भी दरवाजे खुल रहे हैं.पिछले समाज में बदलाव के माध्यम थे, विचार, राजनीतिक दल, धर्म, सामाजिक सुधार आंदोलन वगैरह. पर अब एनजीओ संगठन और ठेकेदार बन गये राजनीतिक कार्यकर्ता भी अपने-अपने ढंग से अपनी छाप छोड़ रहे हैं.
गांवों में जो मजदूर शहर गये, वे भी बदल कर लौटते हैं.इस तरह ’90 के दशक में उदारीकरण के गर्भ में अनेक तत्व निकले हैं, जो गांवों का मानस बदल रहे हैं. यह बदलाव सिंगापुर के ली क्यान यू का कथन याद दिलाता है. भारत के गांवों के शहरीकरण के बिना नया भारत नहीं बनेगा.
वह कलाम के पूरा माडल से सहमत नहीं हैं. उनका मानना है कि चीन हर वर्ष एक करोड़ चीनी लोगों को गांव से शहर में बसा रहा है. ब्राजील में भी तेज नगरीकरण हो रहा है. ली याद दिलाते हैं कि पुराने ग्रीक को याद करें. क्या सुकरात और वर्जिल गांवों में रहते थे? नहीं, वे तब के शहरों में थे, जो सुविधा संपन्न थे.
Prabhat Khabar
Palamu Bangale ke baramde mey
Desh Kaha Pahuch Gaya Hai

उग्रवाद की गोद में विकास की पहल

डा. विष्णु राजगढि़या
लगभग सत्ताइस साल पहले चार सामाजिक कार्यकर्ताओं ने नेतरहाट के वीरान इलाके बिशुनपुर में आदिवासियों के बीच विकास का अलख जगाना शुरू किया। आज वह प्रयास जादू की तरह अपना असर दिखा रहा है। उग्रवाद से गंभीर रूप से ग्रसित जिन इलाकों में पुलिस भी नहीं घुसती वहाँ भी इस संस्था की सहज पहुँच है।  विकास भारती की स्थापना 1983 में अशोक भगत, डॉ. महेश शर्मा, रजनीश अरोड़ा और स्वर्गीय डॉ. राकेश पोपली की पहल पर हुई थी। विकास भारती के वर्तमान सचिव अशोक भगत बिशनपुर के आदिवासी समुदाय के बीच कार्य करने के मिशन के साथ आए थे। उन्होंने क्षेत्र का सर्वेक्षण किया तो महसूस किया कि इस समुदाय के बीच कार्य करने के मिशन के साथ आए थे।

उन्होंने क्षेत्र का सर्वेक्षण किया तो महसूस किया कि इस समुदाय के समुचित विकास के लिए अलग किस्म के प्रयासों की जरूरत है। नेतरहाट के तल पर बसा यह प्रखंड पूरी तरह वीरान, सुप्त और उजाड़ था। जादू-टोना, टोटका, डायन-बिसाही, गैरकानूनी भूमि दखल की एक पूरी दुनिया आबाद थी। विकास के नाम पर तब यहाँ अँगरेजों के जमाने की मात्र एक पक्की सड़क थी।

जिस समय भगत यहाँ आए, उस दौर में जमींदार तेजी से आदिवासियों की जमीन हड़प रहे थे। आदिवासी समुदाय अपने परंपरागत धंधे कृषि, कारीगरी, ग्रामीण कला एवं शिल्प से दूर होते जा रहे थे। उनके 27 वर्षों की अनवरत मेहनत रंग लाई है। विकास भारती ने आज आदिवासियों में शिक्षा, अधिकार, सजगता, मानसिक ताकत एवं जागरूकता बढ़ा दी है। जागरूकता का नतीजा है कि अब ग्राम स्वराज की माँग होने लगी है। विकास भारती ने आज झारखंड के 2000 गाँव में अपना कार्य फैला लिया है। विकास भारती आदिवासी समुदाय के अंदर आत्मविश्वास कायम करने के‍ लिए और अपने लक्ष्य समुदाय, समूहों एवं व्यक्तियों को क्षमतावान बनाने के लिए कार्य करता है। 
किसी भी समुदाय के सशक्तीकरण के लिए शिक्षा सबसे शक्तिशाली साधन है। इसे देखते हुए विकास भारती ने समाज के वंचितों के तीन समूह अनाथ, विकलांग एवं व‍ंचित अथवा क्षितिजों की शिक्षा के लिए विशेष बल दिया है। अनाथ बच्चों के लिए बने श्रम निकेतन में आवासीय व्यवस्था में सभी मूलभूत सुविधाओं के साथ सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक शिक्षा दी जाती है। संस्था में शक्तिमान केंद्र हैं जो विकलांग बच्चों की विशेष आवश्यकताओं का प्रबंध करता है। प्राथमिक शिक्षा एवं व्यावसायिक कौशल प्रशिक्षण प्रदान करने के अतिरिक्त विकास भारती इन बच्चों को झारखंड के ख्‍यातिप्राप्त चिकित्सालयों में अस्थि चिकित्सा हेतु वित्तीय एवं भावनात्मक सहयोग भी प्रदान करता है।

ऐसे बच्चों तक पहुँचने के लिए जो दूरस्थता के कारण या अपने माता-पिता की आजीविका हेतु किए जाने वाले संघर्ष के कारण शिक्षा को बीच में ही छोड़ देते हैं, विकास भारतीय सर्व शिक्षा अभियान में शामिल होकर राज्य के उन दूरस्थ क्षेत्रों के बच्चों को शिक्षित करने का कार्य कर रहा है।

श्रम निकेतन, कोयलेश्वर नाथ विद्या मंदिर, जतरा टाना भगत विद्या मंदिर पास के ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों के लिए उत्कृष्ट केंद्र साबित हुए हैं। ऐसे केंद्र औपचारिक विद्यालयों से विविध कारणों से शिक्षा-वंचित बच्चों को भी आच्छादित करते हैं। शबरी आश्रम, निवेदिता आश्रम, टैगोर आश्रम, वाल्मीकि आश्रम, विश्वकर्मा आश्रम, एकलव्य आश्रम जैसे नौ आश्रमों में 12 जनजातियों के सैकड़ों बच्चे प्रशिक्षण ले रहे हैं।

सैद्धांतिक और गैर-सैद्धांतिक शिक्षा प्रदान करने हेतु औपचारिक विद्यालयों और आश्रमों के संचालन के अलावा विकास भारती सर्व शिक्षा अभियान की साझेदारी में प्राथमिक स्तर पर इन बालिकाओं के लिए शिक्षा के राष्ट्रीय कार्यक्रम -एनपीइजीइएल जो भारत सरकार का दुर्गम स्थलों में रहने वाली बालिकाओं तक पहुँचने का एक केंद्रीभूत कार्यक्रम का संचालन कर रहा है। जिन गाँवों में आँगनबाड़ी केंद्र नहीं हैं, वहाँ के बच्चों को बालपन केंद्रों के जरिये पूर्ण विद्यालयी शिक्षा देने का काम किया जा रहा है। इसके तहत अब तक 2187 बच्चों को लाभान्वित किया जा चुका है।

झारखंड विधानसभा से सेवानिवृत्त होने के बाद विकास भारती से जुड़कर सामाजिक विकास में योगदान कर रहे अयोध्यानाथ मिश्र बताते हैं कि झारखंड में ऐसी संस्थाओं के प्रयासों की बेहद आवश्यकता है। विकास भारती और इससे संबंधित संगठनों ने झारखंड के युवाओं के क्षमता विकास के लिए मुख्‍य रूप से तीन कार्यक्रम चला रखे हैं।

जनशिक्षण संस्थान, तकनीकी संसाधन केंद्र और ग्रामीण युवा ज्योति। जनशिक्षण संस्थान कार्यक्रम भारत सरकार की योजना है। इसके तहत गरीबों, निरक्षर, नवसाक्षर, अभिवंचितों और दुर्गम क्षेत्रों के लोगों, विशेषकर 15-35 आयु वर्ग के लोगों को केंद्र में रखते हुए व्यावसायिक शिक्षा प्रदान की जाती है। यह संस्थान इस अर्थ में खास है कि यह केवल कौशल विकास का ही कार्य नहीं करता बल्कि साक्षरता को व्यावसायिक कौशल से जोड़ने और लोगों को समृद्धात्मक शिक्षा बह‍ुतायत मात्रा में प्रदान करते हैं।

1985 में स्थापित ग्रामीण तकनीक केंद्र का उद्देश्य देशज तकनीक कला, शिल्प को संवर्द्धित एवं संरक्षण करना तथा ग्रामीण समुदाय को उद्यमिता विकास के विविध कौशलों पर प्रशिक्षण देना भी है। ग्रामीण युवा ज्योति योजना केवल व्यावसायिक कौशल प्रदान करने मा‍त्र के लिए नहीं है बल्कि जीवन कौशल, व्यक्तित्व विकास हेतु सुझाव और सूचना प्रदान करने का भी कार्य करता है।

एनआरएचएम और झारखंड सरकार के सहयोग से वर्ष 2007 में शुरू की गई यह योजना राज्य के 24 जिलों में चल रही है। इसके द्वारा राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित दुर्गम क्षेत्रों में स्वास्थ्‍य शिविरों का प्रबंध किया जाता है। ग्रामीण समुदाय के दरवाजे पर प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा मुहैया कराने की इस योजना के तहत अब तक 6336 शिविर आयोजित किए जा चुके हैं। इससे 862779 रोगियों ने लाभ उठाया है। चलत मोबाइल मेडिकल गाड़ी जिसमें विभिन्न तरह की जाँच सुविधा जैसे एक्स-रे, पैथोलॉजी आदि की सुविधा होती है, डॉक्टरों-विशेषज्ञों के साथ गाँव-गाँव भेजे जाते हैं। इसी तरह 2006 में शुरू किए गए चलंत पंचायत स्वास्थ्‍य कार्यकर्ता या एमपीएचडब्ल्यू के द्वारा अब तक 12 हजार 643 ग्रामीण रोगी लाभान्वित हो चुके हैं। विकास भारती के द्वारा लोगों को साफ-सफाई के प्रति सजग बनाने के लिए स्वच्छता परियोजना और संपूर्ण स्वच्छता अभियान भी चलाए जाते हैं।

कृषि क्षेत्र में राज्य को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कृषि विज्ञान केंद्र, बीज ग्राम, किसान क्लब, राष्ट्रीय बागवानी मिशन, मेसो प्रोटोटाइप जैसी योजनाएँ सफलतापूर्वक चलाई जा रही हैं। स्वयं सहायता समूह, महिला उद्योग, ग्राम तकनीकी, ग्रामीण युवा ज्योति, अंबेडकर हस्तशिल्प योजना, स्वावलंबन धारा और अन्य कार्यक्रमों के द्वारा जरूरतमंदों को आत्मनिर्भर बनाने पर काम हो रहा है।

पर्यावरण संरक्षण के संदर्भ में समाज को जागरूक करने के लिए विकास भारती ने वर्ष 2008-09 में वन, पानी, स्वास्थ्‍य-जन पहल प्रेरणा और नदी बचाओ, पारिस्थितिकी बचाओ अभियान शुरू किया। नदियों के विषय में धार्मिक भावना पैदा करने हेतु दो वर्ष पूर्व एक राज्यव्यापी गंगा दशहरा उत्सव का आयोजन किया गया। इसे 125 प्रखंडों में चलाया गया। राँची जिले में हरमू नदी का पूजन किया गया। नागरिकों ने अनुभव किया कि वह दिन दूर नहीं जब राँची शहर की जीवन रेखा समाज के कुछ प्रभावकारी परिवारों के निहित स्वार्थों के चलते समाप्त हो जाएगी।

'हरमू नदी बचाओ आंदोलन समिति' का गठन किया गया। नतीजा यह हुआ कि हरमू को बचाने के लिए प्रशासन के साथ-साथ समाज का हर तबका सामने आ गया। बरियातू स्थित विकास भारती के आरोग्य भवन में 30 प्रकार के विभिन्न व्यावसायिक पाठ्‍यक्रम चलाए जाते हैं। 15 दिनों से लेकर छह माह तक चलने वाले पाठ्‍यक्रमों की समाप्ति के बाद प्रशिक्षितों का एक स्वयं सहायता समूह बनाकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इसके अलावा आरोग्य भवन केंद्र से इस वर्ष से प्रबंधन पाठ्‍यक्रम की व्यवस्‍था उपलब्ध कराए जाने की कोशिश की जा रही है।

अशोक भगत कहते हैं कि राज्य में नक्सली समस्या कभी भी हमारे लिए बाधक नहीं बनी। हम जिस भावना के साथ कार्य करते हैं, उसके लिए किसी के साथ टकराहट की कोई गुंजाइश ही नहीं रहती। हमारा उद्देश्य निजी लाभ के लिए संसाधन जुटाना नहीं है। निजी हित से ऊपर उठकर जब भी कोई व्यक्ति, संस्था कार्य करेगी, किसी भी तरह की मुश्किलें उसका रास्ता नहीं रोकेंगी।
Published in Nai Dunia Magazine

एक शाम, हरिवंश के नाम

डा. विष्णु राजगढि़या
संस्मरण सुनाते हरिवंश

प्रभात खबर के प्रधान संपादक हरिवंश को पढ़ना और सुनना यूं भी काफी दिलचस्प, प्रेरक और ज्ञानवर्द्धक होता है। वह भी जब विषय बिलकुल लीक से हटकर हो। यही कारण है कि सात जुलाई 2011 की शाम सात बजे विकास भारती में ‘एक शाम, हरिवंश के नाम‘ कार्यक्रम के लिए श्री अशोक भगत का बुलावा आया तो मैंने इसमें जाना जरूरी समझा।
श्री अशोक भगत ने इसमें अपने करीबी चुनिंदा सामाजिक कार्यकत्र्ताओं, अधिकारियों, बुद्धिजीवियों, नागरिकों को ही न्यौता था। यह कोई मीडिया इवेंट भी नहीं था। न छायाकारों की भीड़भाड़, न टीवी कैमरामैनों की आपाधापी। न ‘शहर में आज‘ स्तंभ में कोई सूचना, न कल के अखबार में कोई खबर। न मंच पर कोई कुरसी, न स्वागत, धन्यवाद और वक्तव्यों का सिलसिला। यहां तक कि खुद प्रभात खबर के सहकर्मी भी कार्यक्रम में नजर नहीं आये, जो हरिवंश जी के लिए यह आयोजन निहायत व्यक्तिगत और सादगीपूर्ण होने का एक और संकेत था। बगैर किसी औपचारिकता तत्काल विषय पर आने से पहले हरिवंश जी ने इस आयोजन के शीर्षक ‘एक शाम हरिवंश के नाम‘ को स्वप्रचार से दूर रहने के अपने स्वभाव के प्रतिकूल होने का बेहद विनम्र संकोच के साथ उल्लेख करते हुए उपस्थित प्रियजनों को सीधे संबोधित किया।
विषय भी कम दिलचस्प नहीं था - ‘कैलाश मानसरोवर यात्रा के संस्मरण‘। पिछले महीने चिन्मय मिशन के स्वामी माधवानंद जी के साथ कैलाश मानसरोवर परिक्रमा पर गयी टीम में हरिवंश भी शामिल थे। ऐसी किसी यात्रा से लौटकर कोई अपने संस्करण किस तरह सुनायेगा, इसकी कल्पना की जा सकती है। लेकिन वह व्यक्ति अगर हरिवंश हो, तो उन्हें जानने वालों के कौतूहल की मात्रा काफी अधिक होना स्वाभाविक है।
हरिवंश जी किसी भी विषय पर लिखने, बोलने या निर्णय लेने से पहले काफी पूर्व तैयारी, शोध और अध्ययन करते हैं। लेकिन ठीक यही चीज कैलाश मानसरोवर की यात्रा और इससे जुड़े संस्मरण सुनाने से दौरान भी करेंगे, ऐसा एहसास नहीं था।
संस्मरण की शुरूआत उन्होंने कैलाश मानसरोवर से जुड़े अपनी पूर्व धारणाओं और इससे संबंधित पुस्तकों के अध्ययन से हासिल जानकारियों के आधार पर की। विभिन्न लेखकों की पुस्तकों के अंश उद्धृत करते हुए उन्होंने बताया कि किस तरह यात्रा में जाने से पहले इनके अध्ययन के जरिये कैलाश मानसरोवर से जुड़े एक-एक पहलू की बारीकी से जानकारी हासिल करने का प्रयास किया। यात्रा की पृष्ठभूमि कैसे बनी, क्यों वह इसी वर्ष इस यात्रा के लिए उत्सुक थे, स्वामी माधवानंद के सहयोग से कैसे यह यात्रा संभव हो सकी और फिर किस तरह सहयात्रियों के साथ उन्होंने इस कष्टसाध्य यात्रा को हंसते-हंसते पूरा किया, इसका सारा विवरण। इसे सुनना जितना रोचक था, उतना ही ज्ञानवर्द्धक।
 यात्रा के दौरान हरिवंश ने अपने कैमरे से ढेर सारी तसवीरें भी लीं। बताया कि किस तरह पहली बार एक छायाकार की तरह फोटोग्राफी का आनंद लिया। इन तसवीरों को प्रोजेक्टर के माध्यम से बड़े परदे पर दिखाते हुए हरिवंश ने एक-एक मनोरम दृश्य का वर्णन करते हुए मानो पूरे कैलाश मानसरोवर को श्रोताओं के सामने साक्षात प्रस्तुत कर दिया। खुद किस तरह के दड़बेनुमा कमरों में रात गुजारते थे, इसकी भी तसवीरें। जिन यात्रियों के पास बेहतर साधन नहीं होते, वे किस तरह तंबूओं में रात गुजारते हैं, ऐसी तसवीरें लेना भी नहीं भूले हरिवंश। जाहिर है कि समाजवादी पृष्ठभूमि उन्हें इस दौरान भी हैव्स और हैव नोट का फर्क देखने की दृष्टि दे रही थी।
इस दौरान उन्होंने सहयात्रियों की कुछ समूह-तसवीरें भी दिखायीं। इन तसवीरों में हम हरिवंश को तलाशते हुए भूल चुके थे कि छायाकार तो खुद हरिवंश थे। श्रोताओं में बैठे स्वामी माधवानंद ने एक बार चुटकी लेते हुए कहा भी- इन तसवीरों में आपको हरिवंश नहीं मिलेंगे क्योंकि फोटो तो खुद हरिवंश ही उठा रहे हैं। हालांकि बाद की एक-दो तसवीरों में हरिवंश भी दिखे, अधपकी बढ़ी दाढ़ी और अदम्य ऊर्जा से दमकता खिलखिलाता चेहरा।
एक-एक पड़ाव से जुड़े रोचक प्रसंग, स्थानीय विशिष्टताओं का वर्णन और उनसे जुड़ी मान्यताओं पर अपना नजरिया। संस्मरण सुनते हुए हैरान था कि कैसे कोई आदमी किसी विषय पर इतने विस्तार से जाकर पढ़, सोच, देख सकता है और कैसे अपनी स्मृतियों का अंग बनाते हुए इतने सहज एवं रोचक तरीके से दूसरों को सुना सकता है। नेपाल के रास्ते चीन में प्रवेश के दौरान नेपाल-चीन सीमा पर घंटों किसी आम आदमी की तरह इंतजार और सुरक्षा जांच की उबाऊ प्रक्रिया से गुजरने का प्रसंग हो या फिर चीन द्वारा कैलाश मानसरोवर यात्रियों को कोई वीजा नहीं दिये जाने की वजहों का विवरण, खतरनाक रास्तों से गुजरने का रोमांच हो या फिर मामूली कमरों में बेहद कम सुविधाओं के साथ रात बिताने और शौचालय के अभाव में नित्य-क्रिया के लिए खुले मैदान में जाने जैसी स्थितियों को सहर्ष स्वीकारने जैसे प्रसंग काफी दिलचस्प रहे। एक रात किसी ने रजाई उठा ली और कड़कती ठंढ़ की रात गुजारने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था की मशक्कत हो, या फिर एक रात श्वांस संबंधी परेशानी आने के बावजूद सहयात्रियों की परेशानी का ध्यान रखते हुए चुपचाप सहन कर लेने से जुड़े अनुभव भी कम रोचक व प्रेरक नहीं थे। अध्ययनशीलता का ही नतीजा है कि एक रात बाहर निकलने से पहले उन्हें हिंसक कुत्तों से किसी खतरे के बोध ने सावधान किया। ब्रह्मपुत्र नदी से जुड़े प्रसंगों को अपनी पूर्व स्मृतियों से जोड़ते हुए भविष्य के खतरों से जोड़ते हुए चीन और भारत संबंधों की चर्चा करके हरिवंश ने जाहिर कर दिया कि ऐसी यात्राओं के क्रम में कितने विविध आयामों को देखा, समझा जा सकता है।
कैलाश मानसरोवर की यात्रा को धार्मिक एवं आध्यात्मिक पहलुओं से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन अपनी पृष्ठभूमि के अनुरूप हरिवंश ने इसे महज धार्मिक या आध्यात्मिक कर्मकांड के बजाय प्रकृति व सृष्टि की अद्भुत रचना और रहस्यों से जोड़कर देखते हुए इससे जुड़ी विविध मान्यताओं और अवधारणाओं पर विस्तार से चर्चा की। उन्हें एक अलग नजरिये से देखने और समझने की कोशिश करते हुए नये आयाम दिये। निश्चय ही इस संस्मरण के श्रोताओं को इन विषयों पर अलग तरीके से सोचने की दृष्टि मिली और संयोगवश भविष्य में किसी को ऐसी यात्रा का अवसर मिले तो वह एक बार उस नजरिये से देखने की कोशिश करेगा।
ऐसे किसी धार्मिक केंद्र की यात्रा से पहले जब दूसरे लोगों अपने मामूली या जरूरी सुविधाओं की चिंता करने और उन्हें सहेजने-समेटने की लाजिस्टिक चीजों तक अपनी सारी ऊर्जा केंद्रित रख छोड़ते हों, तब श्री हरिवंश का उस यात्रा से पहले ऐसा गहन अध्ययन-मनन करना और यात्रा के दौरान हरेक पहलू का ऐसा बारीक पर्यवेक्षण वाकई अनुकरणीय है। विकास भारती के सचिव श्री अशोक भगत को धन्यवाद, जिनके सौजन्य से इस सुखद प्रसंग का सहभागी होने का अवसर मिला।

Saturday, 9 July 2011

पंचायत चुनाव की दिशा में बढ़ा झारखंड

डा. विष्णु राजगढि़या

रांची: 11-04-10- झारखंड सरकार ने 30 जून से पहले पंचायत चुनाव कराने की घोषणा कर दी है। इससे राज्य में विकास के नये रास्ते खुलेंगे। बत्तीस साल से झारखंड में पंचायत चुनाव नहीं हुए हैं। इसके कारण ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय स्वशासन पूरी तरह ध्वस्त है। नयी पीढ़ी को पंचायती व्यवस्था के बारे में कुछ पता नहीं। पुरानी पीढ़ी भी इसके बारे में सब कुछ भूल चुकी है। अब पंचायत चुनाव के साथ ही सारी प्रक्रिया नये सिरे से शुरू होने की उम्मीद की जा रही है।
हालांकि पेसा कानून के तहत कराये जा रहे पंचायत चुनाव पर कुछ सदान नेताओं ने तीखी प्रतिक्रिया जाहिर की है। इससे पंचायत चुनाव में विध्न उत्पन्न होने की संभावना जतायी जा रही है। फिलहाल सरकार ने दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय देते हुए हर हाल में 30 जून से पहले पंचायत चुनाव कराने की घोषणा की है। इसके अलावा, जिन नगर निकायों के चुनाव अब तक नहीं कराये गये हैं, उनके चुनाव भी मई में कराने की तैयारी कर ली गयी है।
शुक्रवार को राज्य मंत्रिपरिषद की बैठक में पंचायत चुनाव को हरी झंडी दिखा दी गयी। राज्य के मुख्य सचिव डा. एके सिंह ने इसकी विधिवत घोषणा भी कर दी। राज्य निर्वाचन आयोग से मिली सूचना के अनुसार चार चरणों में चुनाव होंगे। जून के प्रथम सप्ताह से बीस जून तक चुनाव कराये जा सकते हैं। पंचायत राज्य सचिव संतोष कुमार सत्पथी के अनुसार पंचायत चुनाव कराने के लिए विभाग के पास 75 करोड़ की राशि उपलब्ध है। चुनाव ईवीएम मशीन से कराये जायेंगे। चुनाव में 45000 इवीएम की जरूरत होगी। चुनाव के लिए 74 हजार सुरक्षाकर्मियों की आवश्यकता का आकलन किया गया है। मुख्यमंत्री ने 19 अप्रैल को सभी उपायुक्तों की बैठक बुलायी है।
मालूम हो कि स्थानीय निकायों के चुनाव नहीं होने के कारण विगत दस वर्षों में झारखंड को लगभग 2200 करोड़ की केंद्रीय सहायता से वंचित होना पड़ा। इसके अलावा, ग्रामीण विकास एवं शहरी निकायों के कामकाज में जनभागीदारी के अभाव के कारण बिचैलियों की चांदी रही और योजनाओं में जमकर लूट हुई। अब पंचायत और नगर निकाय चुनाव से केंद्रीय सहायता मिलने और योजनाओं में लूटखसोट पर रोक लगने के रास्ते खुल जायेंगे।
पंचायत चुनाव में महिलाओं को पचास फीसदी सीटों पर आरक्षण मिलेगा। इसके लिए पंचायत चुनाव अधिनियम 2001 में जल्द ही संशोधन किया जायेगा। पेसा कानून के तहत पंचायत चुनाव होगा। राज्य के 260 में से 132 प्रखंड अनुसूचित जनजाति के लिए अधिसूचित हैं। इन 132 प्रखंडों में प्रमुख का पद अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित रहेगा। उपप्रमुख और मुखिया के पद अनारक्षित हैं। इसी तरह, अधिसूचित क्षेत्रों में मुखिया का पद अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित रहेगा। राज्य की 4562 पंचायतों में से 2071 पंचायतें अधिसूचित हैं।
पंचायत चुनाव में पेसा के पेंच को लेकर अब तक काफी विवाद रहा है। पहले भी राज्य सरकार ने पंचायत चुनाव की कोशिश की थी। अदालत में विभिन्न मुकदमों के कारण ऐसा संभव नहीं हो पा रहा था। बारह जनवरी को सर्वोच्च न्यायालय ने पेसा के तहत पंचायत चुनाव कराने का स्पष्ट निर्देश देकर सारी बाधाएं दूर कर दीं। पेसा के तहत अनुसूचित जनजाति को मिले आरक्षण पर कुछ सदान नेताओं ने आपत्ति करते हुए 13 अप्रैल को झारखंड बंद की घोषणा की है। सदान नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट एवं झारखंड हाईकोर्ट का भी दरवाजा खटखटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके कारण पंचायत चुनाव में विधि-व्यवस्था के संकट या अदालत के हस्तेक्षप के कारण बाधा उत्पन्न होने की संभावना कायम है। सत्ता का विकेंद्रीकरण करने की दिशा में सदान समुदाय का सहयोग मिलेगा तथा उनकी नाराजगी दूर हो जायेगी।
भूरिया कमेटी की अनुशंसा के आलोक में 1996 में पेसा कानून बना था। इसका पूरा नाम है- पंचायत राज विस्तार अधिनियम। देश के नौ राज्यों में पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत पेसा कानून लागू है। ये राज्य हैं- झारखंड, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश, ओडि़शा और गुजरात। इनमें झारखंड के सिवाय अन्य सभी राज्यों में पेसा के प्रावधानों के अंतर्गत पंचायत चुनाव कराये जा चुके हैं। ऐसे में सिर्फ झारखंड का पंचायत के बहुआयामी लाभों से वंचित रहना अनुचित है। लिहाजा, राज्य में पंचायत चुनाव की पहल का समाज के व्यापक हिस्सों ने स्वागत किया है और अगर सरकार इस बार चुनाव कराने में सफल होती है तो इसे राज्य की एक बड़ी उपलब्धि माना जायेगा।

जाति सत्यापन की भेंट चढ़े एसटी बेरोजगार

डा. विष्णु राजगढि़या
जुलियस एक्का
रांची: पांच राज्यों के 143 एससी-एसटी बेरोजगारों को जाति प्रमाणपत्र का सत्यापन नहीं हो पाने के कारण सरकारी नौकरी से हाथ धोना पड़ा। चार साल बीत जाने के बावजूद बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडि़शा और छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों के जिलाधिकारियों ने ऐसे बरोजगारों के जाति प्रमाणपत्र का सत्यापन करने की जरूरत नहीं समझी।
बीसीसीएल में डंफर आपरेटर के साक्षात्कार में सफल होने के बावजूद नौकरी से अब तक वंचित रांची के एक आदिवासी बेरोजगार जुलियस एक्का ने सूचना का अधिकार के जरिये इस सच्चाई को उजागर किया है।
नई दुनिया के पास इस बाबत मौजूद दस्तावेज बताते हैं कि बार-बार स्मरण कराने के बावजूद जिलाधिकारियों के कान में जूं तक नहीं रेंगी। कोल इंडिया ने वर्ष 2006 में अनुसूचित जाति एवं जनजाति के रिक्त पदों पर नियुक्ति के लिए विशेष अभियान चलाया था। इसके तहत बीसीसीएल ने कुल 187 पदों के लिए उम्मीदवारों का चयन कर लिया। इनमें अनुसूचित जाति के 108    तथा अनुसूचित जनजाति के 79 उम्मीदवार थे। ये बेरोजगार बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडि़शा और छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों के थे। इन उम्मीदवारों के जाति प्रमाणपत्र के सत्यापन के लिए संबंधित जिलाधिकारियों को भेजा गया। लेकिन सिर्फ 76 उम्मीदवारों के जाति प्रमाणपत्र का सत्यापन किया गया। शेष 111 बेरोजगारों के बारे में संबंधित जिलाधिकारियों ने कोई सूचना नहीं भेजी। इसके कारण ऐसे बेरोजगारों को हाथ लगी सरकारी नौकरी से वंचित होना पड़ा।
दस्तावेजों से पता चलता है कि बीसीसीएल ने चयन करने के बाद उम्मीदवारों को इसकी कोई सूचना नहीं दी। सिर्फ संबंधित जिलाधिकारियों को जाति प्रमाणपत्र के सत्यापन के लिए बार-बार पत्र भेजे जाते रहे। अगर चयनित बेरोजगारों को भी इसकी सूचना दी गयी होती तो वे अपने प्रयास से जाति प्रमाणपत्र का सत्यापन करा सकते थे।
रांची निवासी जुलियस एक्का का डंफर आपरेटर के बतौर चयन हुआ था। रांची जिला प्रशासन ने उसका जाति प्रमाणपत्र सत्यापित नहीं किया तो बीसीसीएल ने उसके चयन को अमान्य कर दिया। जुलियस एक्का को इसकी जानकारी मिली तो उसने रांची जिला उपायुक्त से आग्रह करके अपने जाति प्रमाणपत्र का सत्यापन कराकर बीसीसीएल को भेज दिया लेकिन बीसीसीएल ने कहा कि अब देर हो चुकी है तथा आपका चयन अमान्य किया जा चुका है। लेकिन जुलियस ने हार नहीं मानी। उसने सूचना के अधिकार के तहत बीसीसीएल एवं रांची जिला प्रशासन से विभिन्न सूचनाएं मांगी। इससे उसे कई महत्वपूर्ण दस्तावेज मिले। यह भी पता चला कि उसके जैसे 111 बेरोजगारों के साथ यही हादसा हो चुका है।
जुलियस का मामला केंद्रीय सूचना आयोग तक भी पहुंचा है। जुलियस ने अब भी उम्मीद नहीं हारी है। देखना है कि जिला प्रशासन की संवेदनहीनता के शिकार जुलियस तथा अन्य बेरोजगारों को न्याय मिल पायेगा अथवा नहीं।

गवर्नर राज में तबादलों पर राजनीति गरम

डा. विष्णु राजगढि़या 
 रांची: झारखंड में एक बार फिर राष्ट्रपति शासन के दौरान तबादलों को लेकर राजनीति गरम होने लगी है। वर्ष 2009 में लगभग 11 महीनों तक चले राष्ट्रपति शासन के दौरान विपक्ष ने तबादलों एवं पदस्थापना में भ्रष्टाचार व मनमानी के गंभीर आरोप लगाये थे। उस दौरान यह भी कहा जा रहा था कि एक राजनीतिक दल विशेष को चुनावी लाभ पहुंचाने और पुलिस-प्रशासनिक मशीनरी का दुरुपयोग करने की मंशा से लगातार तबादले किये जा रहे हैं।
वर्ष 2009 के अंतिम सप्ताह में झारखंड में शिबू सोरेन के नेतृत्व में सरकार बनी। शिबू सरकार में भी तबादलों को लेकर सवाल उठते रहे। लेकिन शिबू सोरेन के इस्तीफे के बाद राष्ट्रपति शासन में अचानक ट्रांसफर और पोस्टिंग का सिलसिला काफी तेज हो गया। थोक के भाव में होने वाली ट्रांसफर-पोस्टिंग को उद्योग का दरजा देते हुए विपक्ष ने आड़े हाथ लिया है। इससे राजभवन की गरिमा पर भी सवालिया निशान लगे हैं।
भाजपा के अनुसार शिबू सरकार ने बेहद जरूरी होने पर ही तबादले किये जबकि राष्ट्रपति शासन में इसे एक धंधा बना लिया गया है। चर्चा है कि शिबू सरकार ने चार महीने में जितने तबादले किये, उससे ज्यादा तबादले गवर्नर राज के 15 दिनों के भीतर कर डाले गये। श्नागरिकों को यह जानने का हक है कि आखिर किसके दबाव में इतने बड़े पैमाने पर तबादलों को अंजाम दिया जा रहा है। झामुमो का मानना है कि गुरुजी ने अपने कार्यकाल में सिर्फ बेहद आवश्यक होने पर ही तथा प्रशासनिक वजहों से तबादले किये जबकि वर्तमान समय में होने वाले तबादलों को लेकर आम नागरिकों में भी हैरानी है।
लगातार जारी तबादलों के बीच कई विवाद भी सामने आये हैं। यहा तक कि इन विवादों के कारण एक वरिष्ठ आइएएस अधिकारी को खमियाजा भी भुगतना पड़ा है। गत दिनों भूमि एवं राजस्व विभाग में अंचल अधिकारियों का बड़े स्तर पर तबादला हुआ। बाद में दो अंचल अधिकारियों के तबादले पर रोक लगा दी गयी। इसके बाद विभागीय सचिव विष्णु कुमार को ही बदल दिया गया। साथ ही दो अंचल अधिकारियों का तबादला रोकने के मामले में उनसे कारण भी पूछा गया है। चर्चा है कि एक बड़े नेता के दबाव में दोनों अंचल अधिकारियों का तबादला रोका गया था। बाद में राजभवन के कोप का शिकार विभागीय सचिव को होना पड़ा। इस क्रम में कांग्रेस की आंतरिक कलह भी सामने आयी है।
झारखंड के गठन के साढ़े नौ वर्षों में विकास की गति अत्यधिक धीमी होने की एक बड़ी वजह प्रशासनिक अस्थिरता को भी माना जा रहा है। राजनीतिक अस्थिरता के कारण पुलिस-प्रशासनिक पदाधिकारियों को भी लगातार अस्थिरता का शिकार होना पड़ा है। महत्वपूर्ण विभागों के सचिव हर दो-चार महीनों में बदल दिये जाते हैं। अधिकांश जिलों और विभागों के प्रमुख पदों पर शायद ही कोई अधिकारी साल भर टिक पाता हो। कुछ जगहों पर तो एक साल में चार-चार अधिकारी बदले जाने का भी रिकार्ड है। ऐसे तबादलों के पीछे राजनीतिक कारणों के साथ ही भ्रष्टाचार के भी गंभीर आरोप लगते रहे हैं। कुछ जिलों के डीसी व एसपी के पदों तथा बड़ी संख्या में थानों के लिए खुलेआम बोली लगने के भी किस्से सामने आते रहे हैं। राष्ट्रपति शासन के पिछले तथा मौजूदा दौर में होने वाले अनगनित तबादलों का औचित्य स्पष्ट नहीं होने के कारण विपक्ष को आरोप लगाने का अवसर मिल रहा है।
हालांकि कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता राधाकृष्ण ने इन आलोचनाओं को अनावश्यक करार देते हुए कहा कि प्रशासनिक कारणों से आवश्यक होने पर ही तबादले किये जा रहे हैं।
दूसरी ओर, पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने भी इस मामले पर कड़े तेवर अपनाकर स्पष्ट कर दिया है कि तबादलों को लेकर राजनीति जारी रहेगी।

32 साल बाद पंचायत की उम्मीद

डा. विष्णु राजगढि़या
झारखंड में नयी पीढ़ी पंचायत का मतलब नहीं जानती। गांव के नौजवानों ने कभी सरपंच को नहीं देखा, मुखिया का नाम नहीं सुना। उन्हें नहीं मालूम कि भारत के संविधान में पंचायती राज की कैसी परिकल्पना की थी। महात्मा गांधी से लेकर राजीव गांधी तक पंचायतों को मजबूत करके गांव का राज ग्रामीणों को सौंपने की बातें भी उनके लिए बेमानी हैं।
कारण यह कि 1978 के बाद कभी झारखंड में पंचायत चुनाव हुए ही नहीं। वर्ष 2000 में बिहार से अलग होकर झारखंड बना। उसके बाद बिहार ने तो पंचायत चुनाव करा लिये, लेकिन झारखंड अब तक पंचायती राज के लिए तरस रहा है। झारखंड अलग राज्य बनने के बाद विभिन्न कानूनी विवादों के कारण पंचायत चुनाव टलता रहा। इसके कारण गावों को स्वशासन के अवसर से वंचित होना पड़ा है। ग्रामीण विकास की अरबों की केंद्रीय सहायता से भी हर साल वंचित होकर यह राज्य लगातार पिछड़ने के लिए बाध्य रहा है। स्थानीय नेतृत्व के अभाव ने ग्रामीण युवाओं को उग्रवादी संगठनों के प्रभाव में आसानी से छोड़ देने का भी रास्ता बना रखा है।
भाजपा सांसद एवं राष्ट्रीय महासचिव अर्जुन मुंडा झारखंड में जल्द-से-जल्द पुचायती चुनाव कराना जरूरी मानते हैं। कहते हैं- महात्मा गांधी ने ग्राम स्वराज का सपना देखा था। पंचायती राज उनका सपना था। उनका स्पष्ट मानना था कि सच्चा लोकतंत्र वह नहीं है जिसमें महज बीस लोग दिल्ली में बैठकर शासन चलाएं। सच्चा लोकतंत्र तो नीचे से, हर गांव में लोगों के द्वारा चलाया जाने पर ही आयेगा। अब झारखंड को पंचायती राज की उम्मीद जगी है। राज्य सरकार इन दिनों पंचायती चुनाव की तैयारियों में जी-जान से जुटी है। गत दिनों राज्य के नये मुख्य सचिव डा अशोक कुमार सिंह ने 30 जून से पहले राज्य में पंचायत चुनाव करा लेने की घोषणा करके राज्य में राजनीतिक एवं सामाजिक हलचल तेज कर दी है। हालांकि पेसा कानून के तहत चुनाव कराने के खिलाफ सदान एवं कुरमी समुदाय के तीखे तेवर के कारण किसी भी वक्त खटाई पड़ने की भी आशंका है। अगर कोई अनहोनी नहीं हुई और चुनाव कराये जा सके, तो इसे झारखंड के लिए एक ऐतिहासिक कदम माना जायेगा।

पंचायत चुनाव कराना आज झारखंड की प्राथमिकता बन चुकी है। इसके लिए राज्य में एक सकारात्मक संवाद का माहौल बनाना जरूरी है। संयोगवश माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस संबंध में स्पष्ट फैसला सुनाकर सारे गतिरोध समाप्त कर दिये हैं।
अब पेसा कानून के तहत राज्य में चुनाव कराने का रास्ता साफ हो गया है। हालांकि पेसा कानून और पंचायती व्यवस्था के विभिन्न प्रावधानों को लेकर जनता के विभिन्न हिस्सों में कई तरह के सवाल मौजूद हैं। सदान एवं कुरमी समुदाय के आंदोलन का नेतृत्व कर रहे पूर्व मंत्री लालचंद महतो के अनुसार का कहना है कि जिन प्रखंडों में आदिवासियों की संख्या नगण्य है, वैसे प्रखंडों में भी मुखिया का पद आदिवासी समुदाय के लिए आरक्षित कर दिया गया है। इस प्रावधान के खिलाफ सदान संगठनों ने 13 अप्रैल को झारखंड बंद कराया और अब आर्थिक नाकेबंदी की जा रही है। इसके बावजूद राज्य सरकार समय पर पंचायत चुनाव कराने के लिए आशान्वित है।

दूसरी ओर, कांग्रेस विधायक दल के नेता राजेंद्र प्रसाद सिंह का मानना है कि राज्य में पंचायत चुनाव तत्काल कराने के लिए विपक्ष हर संभव सकारात्मक मदद करने के लिए तैयार है जबकि स्वयं राज्य सरकार में ही गंभीरता का अभाव है। श्री सिंह के अनुसार इस बेमेल सरकार में किसी भी विषय पर वैचारिक एकता नहीं बन पायी है और पंचायत चुनाव को लेकर सरकार में इच्छाशक्ति का अभाव स्पष्ट तौर पर दिखायी दे रहा है। झारखंड विकास मोरचा के महासचिव प्रदीप यादव के अनुसार राज्य सरकार की मंशा पंचायत चुनाव कराने की नहीं बल्कि महज जनता की आंखों में धूल झोंकने की है।

हालांकि झारखंड और आदिवासी समुदाय के संदर्भ में बात करें तो यहां तो काफी पहले से ही स्वशासन की अनूठी और शानदार परंपरा रही है। आदिवासियों की परंपरागत शासन-प्रणाली में वह सब कुछ था जिसकी परिकल्पना आधुनिक पंचायती राज में की जाती है। झारखंड के वीर शहीदों सिद्धू कानू, चांद-भैरव, तिलका मांझी और बिरसा मुंडा ने आदिवासी स्वशासन की रक्षा करने के लिए अंग्रेजी शासन के खिलाफ ऐतिहासिक संघर्ष किये। अंग्रेजों को भी आदिवासी समुदाय की स्वायत्त शासन प्रणाली और आत्मनिर्भर ग्रामीण व्यवस्था, मुंडा मानकी प्रणाली और ग्राम प्रधान जैसी परंपराओं से खतरा महसूस हो रहा था। इसीलिए उन्होंने आदिवासी स्वशासन व्यवस्था को नष्ट करने की हर संभव कोशिश की।
राज्य के कृषि मंत्री मथुरा प्रसाद महतो का मानना है कि देश को आजादी मिलने के बाद गांवों में सत्ता को केंद्रित करने और पंचवर्षीय योजनाओं को लागू करने के लिए पंचायती राज की व्यवस्था हुई। उस वक्त उम्मीद की जाती थी कि झारखंड को स्वायत्तता मिलेगी और यहां के लोगों को अपना राज खुद चलाने का अधिकार होगा। लेकिन दुर्भाग्यवश बिहार की राजधानी पटना से केंद्रित शासन ने कभी झारखंड और झारखंडवासियों के हितों को प्राथमिकता नहीं दी। यही कारण है कि झारखंड अलग राज्य के लिए लंबा संघर्ष चला।
आजादी के बाद से वर्ष 2000 तक बिहार के साथ जुड़े रहने के कारण झारखंड जहां एक ओर स्वशासन के अवसर से वंचित रहा, वहीं बिहार में 22 वर्षों तक पंचायत चुनाव नहीं होने के कारण राज्य में पंचायती राज का अस्तित्व ही समाप्त हो गया। पहले अंग्रेजों ने झारखंड की परंपरागत पंचायत प्रणाली को नष्ट किया, फिर बिहार के समय में रही-सही कसर पूरी हो गयी।
आदिवासी बहुल इलाकों में इस आबादी के हितों की रक्षा के लिए 15 साल पहले पेसा कानून बना था। इस कानून के तहत देश के कई राज्यों में पंचायत चुनाव कराये जा चुके हैं। छत्तीसगढ़, ओडि़सा, मध्य-प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, हिमाचल प्रदेश और आंध्र प्रदेश में पेसा अधिनियम के तहत पंचायत के चुनाव हो गए। एकमात्र झारखंड ही ऐसा राज्य है जहां अब तक पंचायत चुनाव नहीं हो सका है।
झारखंड एकलौता राज्य हैं जहाँ पंचायती राज संस्थाएं है ही नहीं और जहाँ अनुसूचित क्षेत्र होने के बावजूद पेसा अधिनियम, 1996 अब तक कार्यान्वित नहीं हुआ है। झारखंड बनने के बाद झारखंड पंचायती राज अधिनियम 2001 बना। लेकिन इसमें पेसा के कई महत्वपूर्ण प्रावधानों की अनदेखी कर दी गयी। इसके कारण इसका काफी विरोध हुआ।
पेसा कानून में पंचायती राज के तीनों स्त्तरों में अनुसूचित जनजाति को शत् प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान है। लेकिन झारखंड उच्च न्यायालय ने वर्ष 2005 में एक याचिका पर फैसले के दौरान इस प्रावधान को स्थगित कर दिया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले के जरिए झारखंड में पंचायत चुनाव का रास्ता साफ कर दिया है।
राज्य में पंचायत चुनाव जल्द कराने को लेकर जागरूकता अभियान चला रहे मंथन युवा संस्थान के समन्वयक सुधीर पाल कहते हैं- पंचायत चुनाव होने से झारखंड के गांवों से लगभग 50 हजार जनप्रतिनिधि चुने जाएंगे जो राज्य की राजनीति को सशक्त करते हुए विकासशील और आत्मनिभर झारखंड की बुनियाद रखेंगे। पंचायती राज होने से नौकरशाही के जंजाल से झारखंड की जनता को राहत पाने का नया अवसर मिलेगा।

इसी अभियान से जुड़े सामाजिक कार्यकत्र्ता एवं सुप्रीम कोर्ट के आयुक्त के राज्य सलाहकार बलराम के अनुसार पंचायती चुनाव होने से हर प्रकार की केन्द्रीय सहायता तथा कार्यक्रमों का लाभ झारखंड को मिलने लगेगा। पंचायत चुनाव नहीं होने से अब तक झारखंड जिन योजनाओं से वंचित रहता था, उनका लाभ हम उठा सकेंगे। इससे 13वें वित्त आयोग की अनुशंसा के आलोक में विकास निधि में और इजाफा होगा। सबसे बड़ी बात है कि पंचायत चुनाव होने से दलित, आदिवासी और महिलाओं की स्थानीय स्वशासन में भागीदारी होगी।
पंचायत चुनावों को लेकर राजनीतिक दल और सामाजिक दलों के बीच चाहे जितने भी विवाद हों, गांवों और खास कर नौजवानों में जबरदस्त उत्साह देखा जा रहा है उन्हें उम्मीद है कि इस बार उन्हें अपने गांवों का राज अपने हाथ में लेने का अवसर मिलेगा।

विकास की बाट जोहता गुरुजी का गांव

डा. विष्णु राजगढि़या
नेमरा गांव में मुख्यमंत्री शिबू सोरेन
इस गांव से झारखंड के गुरुजी को आज भी उतना ही लगाव है। कोई भी पारिवारिक कार्यक्रम अब भी यहीं होता है चाहे खुशी का अवसर हो या फिर गम का। ऐसे मौकों पर जब सैकड़ों कार्यकत्र्ताओं के साथ नेताओं, मंत्रियों, विधायकों, अधिकारियों का काफिला इस गांव पहुंचता है तो सबकी जुबान पर एक ही सवाल रहता है कि विकास की राह में आखिर नेमरा जैसे गांव इतने पीछे क्यों छूट गये।
शिबू सोरेन का पैत्रिक गांव नेमरा आज भी विकास से कोसों दूर है। रामगढ़ और बोकारो के औद्योगिक क्षेत्रों से घिरे और जंगलों, पहाड़ों के बीच बसे इस सुदूर गांव के लिए सड़क तक नहीं है। राजधानी से लगभग एक सौ किलोमीटर दूर इस गांव तक पहुंचने के लिए लगभग दस किलोमीटर कच्ची सड़क से गुजरना पड़ता है। उस कच्ची सड़क को इन दिनों पक्की किया जा रहा है। इसके कारण जगह-जगह खेतों से होकर डावयर्सन निकाला गया है। हालांकि यह काम भी एक साल से ज्यादा समय से चल रहा है। रामगढ़-बोकारो मार्ग में गोला प्रखंड मुख्यालय से लगभग 26 किलोमीटर अंदर है यह गांव है। हाल के दिनों में यहां के लोगों ने गांव के समीप जंगल और दो पहाडि़यों को चीरकर बोकारो की ओर जाने का एक बेहतर रास्ता ढूंढ़ निकाला है। श्रमदान के जरिये इसे बनाने की कोशिश की जा रही है।
रामगढ़ जिले के गोला प्रखंड का यह गांव हर तरह की बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। यहां यह गांव बंगाल से झारखंड में घुसने वाले माओवादी उग्रवादियों का रेड कारीडोर है। इस गांव में जंगली हाथी घुस आते हैं। इस बार जिस दिन शिबू सोरेन ने कुरसी संभाली, उस रात जंगली हाथी उनके खेत में घुस आये, फसल नष्ट की और घर की चहारदिवारी गिरा दी। यहां अक्सर जंगली सुअर भी घुस जाते हैं। इसके बावजूद अब भी शिबू सोरेन के परिजन इस गांव में रहकर विकास की बाट जोह रहे हैं। पहले उनके भाई शंकर सोरेन यहां की देखरेख करते थे। पिछले साल उनकी मृत्यु के बाद छोटे भाई लालू सोरेन ने यहां का जिम्मा संभाला।
ऐसे सुदूर गांव में जन्मे शिबू सोरेन को इस उंचाई तक पहुंचाने में इस गांव की बड़ी भूमिका है। वर्ष 1947 में मिली आजादी की कोई रोशनी इस गांव तक नहीं पहुंची थी और सूदखोरों, महाजनों का ही राज चलता था। थोड़े से कर्ज के एवज में आदिवासियों की पूरी फसल लूट ली जाती थी। इसके खिलाफ शिबू सोरेन के पिता सोबरन सोरेन ने अभियान चलाया तो वर्ष 1957 में पहाडि़यों के समीप उनकी हत्या कर दी गयी थी। शिबू सोरेन उस वक्त महज तेरह वर्ष के थे। उस घटना ने उनके भीतर महाजनी प्रथा के खिलाफ नफरत की ज्वाला पैदा कर दी। उन्होंने इसके खिलाफ आदिवासियों को गोलबंद करना शुरू किया और धनबाद के टुंडी इलाके को इसका केंद्र बनाया। नेमरा से उठी यह चिनगारी अंततः झारखंड अलग राज्य के रूप में सामने आयी।
नेमरा गांव में बेटे के विवाह समारोह में शिबू सोरेन
गुरुजी के परिवार के कुलदेवता नेमरा में ही हैं। इस गांव में 115 संताल आदिवासी परिवार रहते हैं। मान्यता है कि संताल के सिवाय कोई भी अन्य आदिवासी अथवा दूसरी जाति का कोई भी यहां बसना चाहता है तो उसका वंश नहीं बढ़ता। इस गांव में आज भी सरकारी नौकरी करने वाला सिर्फ एक आदमी है। वह चतुर्थवर्गीय कर्मचारी है। ज्यादातर आदिवासी परिवारों में शिक्षा का घोर अभाव रहा है। लेकिन अब यहां आठवीं कक्षा तक का सरकारी स्कूल खुल गया है। आठवीं के बाद कुछ बच्चे पैदल अथवा साइकिल से गोला जाकर पढ़ाई कर रहे हैं। नयी दुनिया की टीम जब नेमरा गांव पहुंची तो साइकिल से आते कुछ स्कूली छात्र-छात्राओं को देखकर यह स्पष्ट हो रहा था कि नयी पीढ़ी में शिक्षा के प्रति जागरूकता आयी है।
शिबू सोरेन के पुत्र हेमंत सोरेन इस इलाके की बदहाली को झारखंड आंदोलन की अवधारणा के साथ जोड़कर देखते हैं। झामुमो विधायक दल नेता का दायित्व संभाल रहे हेमंत सोरेन के अनुसार अंग्रेजों की ही तरह आजादी के बाद की भी सरकारों ने सुदूर आदिवासी इलाकों को उपेक्षा का शिकार बनाये रखा। सबकी नजर सिर्फ आदिवासियों की जमीन और झारखंड के खनिजों पर रही। इसलिए नेमरा गांव इस बात का गवाह है कि अलग झारखंड राज्य की जरूरत क्यों पड़ी। अब हमारी कोशिश है ऐसे सुदूर इलाकों को विकास की ओर ले जाना।
हाल के दिनों में कई सरकारी योजनाओं का लाभ नेमरा तथा समीप के गांवों को मिला है। इस गांव तक पहुंचने के लिए दौरान जगह-जगह चल रहे सड़क निर्माण कार्य और जेसीबी मशीनों को देखकर पता इसका पता चलता है। छोटा-सा एक स्वास्थ्य केंद्र भी बन रहा है। नरेगा योजना के तहत साढ़े पांच लाख का एक तालाब बनाया गया है। यहां के निवासी मुख्यतः खेती पर निर्भर हैं लेकिन सिंचाई की कोई सुविधा नहीं है। फिलहाल एक चेक डैम और एक लिफ्ट एरिगेशन का इंतजाम हुआ है। लेकिन लालू सोरेन इसे नाकाफी मानते हैं। कहते हैं- ग्रामीणों का सुझाव है कि नेमरा की दो पहाडि़यों को बांधकर चेक डैम बना दिया जाये और बोकारो की ओर एक रास्ता निकाल दिया जाये तो पूरे इलाके का विकास हो सकता है। डैम से हाइडल प्रोजक्ट लगाकर बिजली पैदा की जा सकती है और डैम बनने से जंगली हाथियों का आना भी बंद हो सकता है।
कृषि और पशुपालन मंत्री मथुरा प्रसाद महतो भी नेमरा गांव को प्राथमिकता की सूची में शामिल किया है। वह ऐसे गांवों के किसानों और आदिवासियों के बीच स्वयं जाकर उनकी जरूरतों को समझने की कोशिश में जुटे हैं। श्री महतो के अनुसार मुख्यमंत्री किसान खुशहाली योजना का लाभ नेमरा तथा समीप के दो गांवों को दिया गया है। पांच सौ किसानों के बैंक खाते खोलकर प्रत्येक को 2500 रुपये की राशि दी गयी है ताकि वे अपनी आजीविका के लिए इसे पूंजी के बतौर उपयोग कर सकें। यहां दो कृषि मित्र बनाये गये हैं। उन्नत खेती के लिए दो पावर टीलर तथा दो पंप सेट दिये गये हैं। दो लिफ्ट एरिगेशन भी लगाये गये हैं। श्री महतो के अनुसार पशुपालन योजनाओं के तहत नेमरा तथा समीपवर्ती गांवों को सुअर पालन और मुर्गीपालन के लिए सुविधाएं दी गयी हैं। बकरी पालन के लिए भी जल्द ही सुविधाएं दी जायेंगी। सिंचाई के लिए तालाब और कुंओं की भी योजना है।
प्रखंड कृषि पदाधिकारी रमनीकांत सिंह इन योजनाओं को लेकर काफी उत्साहित हैं। उनका मानना है कि ऐसे क्षेत्रों में स्टेट बोरिंग के जरिये सिंचाई की व्यवस्था की जाये तो त्वरित विकास संभव है। प्रखंड पशुपालन पदाधिकारी डा. राजीव रंजन के अनुसार पशुपालन से इस इलाके के आदिवासी समुदाय को आजीविका के बेहतर साधन आसानी से उपलब्ध कराये जा सकते हैं। झामुमो के प्रखंड अध्यक्ष काली प्रसाद चक्रवर्ती के अनुसार नेमरा गांव ने झारखंड के इतिहास में बड़ा योगदान किया है और अब हमारा फर्ज है कि इसका कर्ज अदा करें। यहां सोबरन सोरेन का शहीद स्थल है जो हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत है।
सरकार और पदाधिकारियों की प्राथमिकता में आने के बाद नेमरा गांव और इस इलाके को विकास की एक नयी आशा दिखी है। देखना है कि नेमरा और ऐसे अन्य सुदूर गांवों के विकास में सरकार कितनी सफल हो पाती है।

समय पर काम के लिए सिटिजन चार्टर

डा. विष्णु राजगढि़या
रांची : फरवरी 2010 : झारखंड सरकार ने आम नागरिकों के विभिन्न सामान्य काम समय पर पूरा करने के लिए सिटिजन चार्टर बनाया है। समय पर काम नहीं हुआ तो अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित की जायेगी। शुक्रवार को झारखंड मंत्रिमंडल ने इसे मंजूरी दे दी है। इससे राज्य में पारदर्शिता और जवाबदेही का नया परिवेश बनने की संभावना पैदा हुई है। हालांकि इसे लागू करना आसान नहीं होगा। फाइलों पर बरसों धूल चढ़ाने के शौकीन नौकरशाहों और बाबू लोगों को नये परिवेश के लिए तैयार करने के लिए राज्य सरकार को एड़ी-चोटी का पसीना एक करना पड़ सकता है।
ऐसे कार्यों में जाति प्रमाणपत्र, जन्म एवं मृत्यु प्रमाणपत्र, आय, आवासीय एवं स्थानीय निवासी प्रमाणपत्र के अलावा दाखिल-खारिज जैसे कामों को शामिल किया गया है। जाति प्रमाणपत्र व दाखिल-खारिज के लिए 21 दिन का समय निर्धारित किया गया है। अगर आवेदन में कोई आपत्ति हो तो निष्पादन की अवधि अधिकतम 45 दिन होगी। जन्म एवं मृत्यु प्रमाणपत्र के लिए सात दिन का समय दिया गया है। आय प्रमाणपत्र, आवासीय एवं स्थानीय निवासी प्रमाणपत्र 14 दिन में बनाने होंगे। देर के लिए दोषी अधिकारियों को दंडित करने का भी प्रावधान रखा गया है।
ऐसे अनगिनत काम हैं जिन्हें करने में सरकार को एक भी पैसा खर्च करने या कोई भी नया इंफ्रास्ट्रक्चर या नियम-कानून बनाने की जरूरत नहीं है। कार्यसंस्कृति के अभाव और घूसखोरी के चक्कर में काम लटके रहते हैं। इससे जनता निराश होती है और सरकार की बदनामी होती है। जबकि ये काम बेहद आसानी से तय समयसीमा के अंदर पूरे हो सकते हैं। इसके लिए सिटिजन चार्टर बनाया जा रहा है। सूत्रों के अनुसार लगभग दो दर्जन ऐसे कार्यों को चिन्हित किया गया है जिन्हें निश्चित अवधि के भीतर कराया जा सकता है। ऐसे सारे कार्य राज्य सरकार और जिला पुलिस-प्रशासन के दायरे में आते हैं। इनमें विकलांग प्रमाणपत्र, जमीन की रसीद व म्युटेशन, होल्डिंग टैक्स रसीद, मकान का नक्शा, बिजली बिल सुधारना, ड्राइविंग लाइसेंस बनाना, वोटर आइडी बनाना, वोटर लिस्ट में सुधार करना, बिजली व पानी का नया कनेक्शन देना, पासपोर्ट के लिए पुलिस वेरिफिकेशन करना, एफआइआर या सनहा दर्ज करना, टीन नंबर, सोसाइटी रजिस्ट्रेशन, फर्म रजिस्ट्रेशन, मकान एवं जमीन की रजिस्ट्री, वाहन पंजीकरण, शोप एंड इस्टेब्लिसमेंट रजिस्ट्रेशन जैसे काम शामिल हैं। प्रथम चरण में तयशुदा कार्य समय पर करने के अनुभव के बाद सरकार अन्य कार्यों को भी सिटिजन चार्टर में शामिल कर सकती है।

केके सोन : सूचना कानून में भरोसा

रांची: अधिकारियों द्वारा सूचना कानून की उपेक्षा के कारण राज्य के नागरिकों को कई बार निराश और परेशान होना पड़ता है। लेकिन रांची के उपायुक्त केके सोन ने रांची जिले में सूचना का अधिकार कानून को पूरी तरह से लागू कराने का भरोसा दिलाकर नयी उम्मीद पैदा की है।
झारखंड आरटीआइ फोरम ने 16 अगस्त 2009 को होटल चिनार में सेमिनार किया। इसमें श्री सोन ने कहा कि सूचना का कानून सामाजिक विकास के लिए काफी महत्वपूर्ण है. आप सूचना का अधिकार के जरिये तथ्य सामने लायें और अगर कहीं गलत है तो उसकी जानकारी मुझे दें. श्री सोन ने कहा कि ऐसे मामलों पर एक सप्ताह के भीतर कार्रवाई करना मेरी जिम्मेवारी है. आप मुझसे पूछ सकते हैं कि कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

ज्ञात हो कि वर्ष 2007 में जब श्री सोन ने रांची में उपायुक्त का दायित्व संभाला था, उस वक्त राज्य में सूचना कानून की घोर उपेक्षा हो रही थी। लेकिन श्री सोन ने पूरे उत्साह के साथ सूचना कानून को लागू कराकर एक नया माहौल पैदा किया था।
श्री सोन द्वारा एक बार फिर रांची जिले में सूचना कानून का अनुपालन सुनिश्चित करने का भरोसा दिलाया जाना स्वागतयोग्य कदम है। राज्य और जिलों के सभी प्रमुख अधिकारियों को खुलेतौर पर ऐसी ही घोषणा करनी चाहिये ताकि सूचना कानून का लाभ हर नागरिक को मिल सके। राज्य सूचना आयोग को भी इस दिशा में कठोर कदम उठाते हुए यह स्पष्ट संदेश देना चाहिये कि इस कानून का अनुपालन नहीं करने वाले अधिकारियों को बख्शा नहीं जायेगा।

यहां प्रस्तुत है रांची के उपायुक्त केके सोन के वक्तव्य के मुख्य अंश- 
”पारदर्शिता काफी महत्वपूर्ण है। यह सार्वजनिक जीवन और व्यक्तिगत जीवन दोनों के लिए जरूरी है। सूचना का अधिकार कानून इसी पारदर्शिता के लिए बना कानून है। इसलिए मैं भरोसा दिलाता हूं कि मैं अपने अधीन सभी विभागों में सूचना कानून का पूरी तरह से पालन किया जायेगा। इसमें मौजूद कमियों को एक महीने के भीतर ठीक कर दिया जायेगा।
इस कानून के जरिये आप अच्छे काम कर सकते हैं और गलत काम को रोक सकते हैं। अगर एक नागरिक कोई सूचना मांगता है, तो अधिकारियों को कोई भी गलत काम करने से पहले कई बार सोचना पड़ता है कि कहीं उससे चूक तो नहीं हो रही। पिछले तीन साल का अनुभव काफी मिला-जुला है। समाज के जिन कमजोर लोगों के लिए इस कानून का उपयोग होना चाहिए था, वह बेहद कम हो पाया है।
आज सुबह मैं एक गांव में गया था। देखा कि वहां आज भी स्वच्छ पेयजल नहीं है। लोग गड्डे का पानी पी रहे हैं। क्या सूचना का कानून वहां के ग्रामीणों को पानी दिलाने में कोई मदद कर सकता है? आज कुछ ही संगठन सूचनाधिकार पर काम कर रहे हैं। मुझे लगता है कि सामाजिक संगठनों को अपने संसाधनों की मैपिंग करनी चाहिए। क्या हमारे पास ऐसी व्यवस्था है, जिसके तहत हर गांव के संबंध में सूचना हासिल कर सकें? रांची जिले में 298 पंचायतें हैं। क्या हम 298 व्यक्तियों या संगठनों का चयन करके एक-एक पंचायत के बारे में सूचना मांगने और वहां से जुड़े मुद्दे उठाने का जिम्मा दे सकते हैं? अगर हम सिर्फ पानी की बात करें, तो पता चलेगा कि उनमे से 200 पंचायतों में पीने का पानी तक नहीं है। हजारों करोड़ रुपये खर्च करने के बाद भी यह स्थिति है।
हम ऐसी सूचनाओं के जरिये विकास कार्यों में मदद कर सकते हैं। मैं गांवों में जाता हूं तो देखता हूं कि लोगों को नरेगा के बारे में पता नहीं। उन्हें नहीं मालूम कि जाब कार्ड क्या है। नरेगा के साढ़े तीन साल बाद यह हाल है। इसलिए हमें बहुत काम करने की जरूरत है। सिविल सोसाइटी जब तक पहल नहीं करेगी, तब तक विकास अधूरा रहेगा। हमें व्यवस्था बनानी है, मसीहा नहीं बनना। किन जगहों पर मजदूरों को समय पर पूरी मजदूरी नहीं मिल रही, इसकी सूचना मुझे मिले, तो एक उपायुक्त के बतौर मैं इस सूचना का उपयोग करूंगा। अगर आप मुझे ऐसी कोई सूचना देते हैं, तो उस पर एक सप्ताह के भीतर कार्रवाई होगी। नहीं हुई, तो जिम्मेवारी मेरी है। आप मुझसे पूछें कि कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
इससे पहले भी मैंने रांची उपायुक्त का पद संभाला था। मैंने सभी अधिकारियों से कहा कि सूचना तो देनी होगी। हमारे यहां सूचना के जो भी आवेदन आते हैं, मैं संबंधित अधिकारियों को बुलाकर पूछता हूं कि उन्होंने मांगी गयी सूचना दी अथवा नहीं। आज संचार के अनगिनत साधन मौजूद हैं। टेलीफोन के अलावा मोबाइल और एसएमएस है, ईमेल है, इन सबका उपयोग हमें करना चाहिए। मैंने अपने सभी अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे ईमेल पर सूचना ग्रहण करें और उसका जवाब भी दंे। विकास कार्यों का सामाजिक अंकेक्षण जरूरी है। हमें यह देखना होगा कि आखिर लोग हमारी बात कब मानेंगे और कब हम पर भरोसा करेंगे। अगर हम अपनी जगह ठीक हों, तभी लोग हमारी बात मानेंगे।
हमने नरेगा के राज्य स्तरीय सामाजिक अंकेक्षण के लिए जो टीम बनायी, उसमें सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ सरकारी अधिकारियों को भी रखा। ऐसी टीमें अपनी रिपोर्ट दे रहीं हैं। इनमें सरकारी अधिकारी खुद बता रहें हैं कि कहां-कहां गड़बड़ी हुई। इस तरह जब हम कोई गलती महसूस करेंगे, तभी उसे सुधार सकेंगे। आज विभिन्न योजनाओं में सड़क बन रही है। लेकिन आपको पता नहीं कि कब बनी, किस योजना में बनी, और कितने पैसे लगे। हम अपनी वेबसाइट पर वैसी सरकारी सूचनाएं दे देंगे। नरेगा के तहत रांची में कितनी योजनाएं हैं, उन पर कितना खर्च हुआ। इसकी पूरी सूचना हम वेबसाइट पर दे देंगे। अधिकारियों को यह मालूम होगा कि सारी सूचनाएं हर नागरिक के पास मौजूद है, तो वे गलत करने से डरेंगे। अगर आपको सूचना पाने में कोई भी बाधा पाने में कोई भी बाधा होती हो, तो मैं आपकी मदद के लिए हमेशा तैयार हूं।
मैं फिर से कहना चाहूंगा कि पारदर्शिता होनी चाहिए और मैं इस बात को पूरे विश्वास के साथ दोहराता हूं। यह भी कहना चाहता हूं कि सामाजिक अंकेक्षण से ही असली पारदर्शिता आयेगी। अगर गांव के लोग एक जगह बैठ कर इन चीजों पर विचार करना शुरू कर दें, तो काफी बड़ा बदलाव आ सकता है।”
(सूचनाधिकार और सामाजिक निगरानी पर सेमिनार, 16 अगस्त 2009, होटल चिनार में रांची के उपायुक्त केके सोन के वक्तव्य के मुख्य अंश)
---------------------------------------------------------------------------------
सेमिनार की अध्यक्षता झारखंड के पूर्व महाधिवक्ता श्री एसबी गाड़ोदिया ने की। रांची नगर निगम के डिप्टी मेयर अजयनाथ शाहदेव विशिष्ट अतिथि थे। संचालन विष्णु राजगढ़िया ने किया। मंच पर श्री बलराम और प्रो रमेश शरण उपस्थित थे।

हर नागरिक कर सकता है बड़े बदलाव : एके सिंह

 विकास का माडल क्या हो तथा सरकारी राशि का आवंटन कैसे हो, इसे हम आज यहां बैठ कर तय नहीं कर सकते।
लेकिन हमें यह सोचना है कि एक नागरिक के बतौर कुछ कर सकते हैं या नहीं। मैं उन्हीं बिंदुओं पर बात करना चाहूंगा, जिस पर एक नागरिक पहल से कोई बड़ी भूमिका निभा सकता है।

मैं दो उदाहरण देना चाहूंगा, जिसमें एक नागरिक की पहल ने महत्वपूर्ण बदलाव को अंजाम दिया। 1992 में मैं बिहार में जेल आइजी था। जेलों में बीमार लोगों के भोजन के नाम पर घपले की चर्चा होती रहती है। एक नागरिक ने मुझे बताया कि मुजपफ्पुर जेल में हारलिक्स के नाम पर डेढ़ लाख रुपया निकाला गया। मैं दूसरे ही दिन उस जेल में गया। पता चला कि एक भी बोतल की खरीद नहीं हुई थी।

इसी तरह जब मैं गन्ना विकास सचिव था, तो मुझे एक नागरिक ने महत्वपूर्ण सूचना दी। हर किसान अपने गन्ने की आपूर्ति जल्द करना चाहता है कि ताकि वह अपने खेत में दूसरा फसल लगा सके। उसके लिए हर आपूर्तिकर्ता को पर्ची जारी होती थी। ऐसी पर्चियां वास्तविक किसानों को कम तथा पुलिस प्रशासन को कुछ अधिकारियों को ज्यादा मिलती थी। इन पर्चियों को भारी कीमत लेकर बेच दिया जाता था। मुझे जब एक नागरिक ने इसकी सूचना दी, तो मैंने आदेश दिया कि जिसके नाम पर पर्ची होगी, उसी नाम पर चेक का भुगतान होगा। इस एक बदलाव से पूरा पर्ची सिस्टम फेल हो गया।

इसलिए मैं कहता हूं कि व्यवस्था की कमियों को लेकर सिर धुनने और कुंठित होने से बेहतर है कि आप क्या कर सकते हैं, सरकार की नीतियों और योजनाओं को समझें, बजट को समझने की कोशिश करें, तो आप महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इंग्लैंड में विपक्ष अपना एक छाया मंत्रिमंडल बनाता है। हर सांसद को किसी एक विभाग पर नजर रखने का काम मिलता है। कोई जागरूक नागरिक किसी एक विभाग के बारे में अपनी समझ बनाना शुरू करे, तो सकारात्मक पहल कर सकता है।
इसके लिए सूचनाधिकार एक बड़ा हथियार है। अगर आप किसी योजना को समझ लें तो उसकी सूचना हासिल करके उसके सही क्रियान्वयन में मदद कर सकते हैं। आप इस ओर इंगित कर सकते हैं कि आपकी योजना कुछ है और आप कुछ और कर रहे हैं। बजट में खर्च कितना हुआ। यह जानने से ज्यादा जरूरी यह है कि उसका नतीजा क्या निकला, आपको इस आउटकम पर विचार करना चाहिए। यह काम कोई सूचना संपन्न नागरिक ही कर सकता है। जागरूक किसानों का एक समूह ऐसे विषयों पर अध्ययन करें, और एक नागरिक एक विषय पर काम करें, तो वह बड़े बदलाव को अंजाम दे सकता है। गांव में क्या समस्याएं है और विकास की क्या जरूरते हैं, इसे भी तय करने में आप भूमिका निभा सकते हैं। सूचनाएं लेकर आप एडवोकेसी कर सकते हैं।

लोकतंत्र में जनमत का काफी महत्व होता है। अगर कोई निर्माणाधीन पुल बह गया] तो आपको यह देखना चाहिए कि इस पर क्या कार्रवाई हुई। अगर किसी का निलंबन हुआ, तो उसे किस प्रक्रिया में वापस लिया गया। उस पर क्या कार्रवाई हुईं। जवाबदेही तय हुई कि नहीं। नागरिक अगर वाचडाग की तरह काम करके सकरात्मक नजरिये से आगे बढ़े तो बड़े परिवर्तन ला सकता है। हाल ही में आप राज्य और देश में ऐसे अनगिनत उदाहरण देख सकते हैं, जिनमें एक नागरिक ने प्रशासन को सकारात्मक कदम उठाने के लिए बाध्य किया हो। चाहे जितना भी भ्रष्टाचार और संवेदनहीनता हो, नागरिकों की ऐसी पहल के साथ अंतरद्वंद होने पर ही समाज आगे बढ़ता है। दिनकर ने लिखा था-
रजनी हो दीर्घायु भले वह अमर नहीं है।
अरुण बिंदुधारिणी उषा आती ही होगी।

(होटल चिनार, रांची में 23 अगस्त 2009 को सिटीजन्स एजेंडा पर सेमिनार में एटीआइ के महानिदेशक श्री अशोक कुमार सिंह के वक्तव्य के मुख्य अंश)
----------------------------------------------------------------------------
कार्यक्रम की अध्यक्षता चाइल्ड इन नीड इंस्टीट्यूट के झारखंड समन्वयक डा सुरंजन ने की। सुप्रीम कोर्ट कमिश्नर के सलाहकार बलराम और झारखंड आरटीआइ फोरम के सचिव विष्णु राजगढ़िया ने संचालन किया।
झारखंड मीडिया फेलोशिप
.... झारखंड सरकार ने 20 पत्रकारों को मीडिया फेलोशिप के तहत 50-50 हजार की राशि देने की घोषणा की है। यह खासकर युवा एवं गंभीर मीडियाकर्मियों एवं शोधकर्ताओं के लिए एक अनूठा अवसर है। READ
.... झारखंड सरकार ने दस पत्रकारों, छायाकारों को एक-एक लाख रुपये का पुरस्कार देने की योजना बनायी है। दो पुरस्कार राज्य स्तरीय विकास के लिए और दो पुरस्कार जिला स्तरीय पुरस्कार के लिए दिये जायेंगे। जनजातीय भाषाआ में विकास संबंधी दो पत्रकारों, इलेक्ट्रानिक के दो पत्रकारों और दो छायाकारों को पुरस्कार मिलेंगे। READ

अन्ना और रामदेव पर कांग्रेस के प्रहार का मूलमंत्र

भ्रष्टाचार करो, सहो, लड़ो मत
डा. विष्णु राजगढि़या
अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के आंदोलन ने राजनेता-नौकरशाह-कारपोरेट गंठजोड़ की खुली लूट पर गंभीर सवाल उठाये हैं. ये ऐसे सवाल हैं, जो लंबे समय से भारतीय राज-समाज को मथ रहे हैं.
इन बुनियादी सवालों को उठाने की हिम्मत और हैसियत किसी राजनीतिक दल के पास नहीं. इसीलिए ऐसे सवाल अब सिविल सोसाइटी, एनजीओ और बाबा टाइप लोग उठा रहे हैं. कांग्रेस और उसका चाटुकार मीडिया उन सवालों पर चर्चा के बजाय सवाल उठाने वालों पर ही चर्चा केंद्रित करके बचाव का रास्ता ढूंढ़ रहा है.

जो लोग यह कह रहे हैं कि राजनीति के बजाय अन्ना जैसों को समाजसेवा और बाबा जैसों को धरम-करम और योगा में सिमटे रहना चाहिए, उन्हें यह एहसास नहीं कि राजनीतिकों के प्रति भारतीय जनमानस में आम तौर पर और नयी पीढ़ी में खास तौर पर कितनी गहरी अनास्था और घृणा व्याप्त है. विकल्प की तलाश सबको है और कोई विकल्प देने में लेफ्ट से राइट और मध्यमार्गियों तक सब किस कदर अप्रासंगिक हो चुके हैं. रामदेव के पीछे लाखों लोगों के हुजूम और अन्ना हजारे के मंच से राजनेताओं को खदेड़े जाने का मतलब भी यही है.

आज उठे सवालों पर सोचने और शर्मसार होने के बजाय कांग्रेस और उसके चाटुकारों के जवाबी हमलों से यह साबित हुआ है कि भ्रष्टाचार करना जितना आसान है, भ्रष्टाचार से लड़ना उतना ही मुश्किल. 
कांग्रेस और मीडिया के इस प्रहार का मूलमंत्र है- भ्रष्टाचार करो, भ्रष्टाचार सहो, इससे लड़ो मत.

अन्ना हजारे और बाबा रामदेव कभी शासकों को बहुत प्यारे हुआ करते थे. प्रणव मुखर्जी के नेतृत्व में चार केंद्रीय मंत्रियों ने एयरपोर्ट पर बाबा रामदेव के सामने साष्टांग दंडवत करके इसका एहसास भी कराया. बाबा रामदेव का आंदोलन खत्म कराने के लिए कांग्रेस ने क्या गुपचुप समझौता किया, यह एक अलग अध्याय है. लेकिन जब रामदेव ने काला धन और भ्रष्टाचार पर तीन दिनों के तथाकथित तप के नाम पर जनजागरण की जिद नहीं छोड़ी तो कांग्रेस सरकार और उसके मीडिया ने बाबा रामदेव की जो दुर्गति की, वो सबके लिए सबक है.

रामदेव की संस्था ने अरबों की संपत्ति बनायी. अन्ना टीम के सदस्य एडवोकेट शांति भूषण ने भी करोड़ों की जायदाद जुटायी. यह उन्होंने एक दिन में या आज नहीं किया. लेकिन इस पर सवाल तब तक नहीं उठे, जब तक कि ये लोग अपना संपत्ति-साम्राज्य बनाने में जुटे रहे. ये इसी धंधे में जुटे रहते तब भी इन पर सवाल नहीं उठते. इन पर सवाल तब उठे, जब इन्होंने भ्रष्टाचार, काला धन और सत्ता-शीर्ष पर बैठे लोगों के लिए असुविधाजनक सवालों पर नागरिकों को सचेत और एकजुट करना शुरू किया.

अगर अन्ना-बाबा का आंदोलन नहीं होता, तो रामदेव को अपने ट्रस्ट का खजाना भरने की छूट थी. उनके सहयोगी बालकृष्ण को तथाकथित फरजी पासपोर्ट का उपयोग करने से भी कोई नहीं रोक रहा था. शांतिभूषण भी अपने आर्थिक साम्राज्य के विस्तार को स्वतंत्र थे. इन सबको अचानक सवालों के घेरे में लाकर शासक वर्ग ने साफ संदेश दिया है- हर कोई अपनी औकात में रहते हुए भ्रष्टाचार की मूल धारा में इत्मिनान के साथ गोते लगाता रहे. जिस किसी ने इस मूल धारा के विपरित जाने या इसमें बहते हुए इसके विपरित धारा बहाने की कोशिश की, उसकी खैर नहीं.

कोई आश्चर्य नहीं यदि किरण बेदी से लेकर अन्ना टीम के अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसौदिया जैसे लोगों को भी ठिकाने लगाने के लिए जल्द ही कोई शिगूफे छोड़ दिये जायें. कांग्रेस और मीडिया के प्रहार का साफ संदेश है कि जो कोई भी ऐसे आंदोलनों में आगे आयेगा, उन्हें उनके ही इतिहास के पन्नों में धकेल दिया जायेगा.

जो लोग अन्ना और रामदेव के आंदोलन की तथाकथित असफलता से खुश हैं, उन्हें मालूम होना चाहिये कि यह इस देश में गांधीवादी सत्याग्रही आंदोलनों की ताबूत में आखिरी कील साबित होगी. इसके बाद का रास्ता सिर्फ व्यापक जनविद्रोह, अराजकता या हिंसक संघर्षों की ओर ही ले जायेगा.

प्रसंगवश, हताशा में रामदेव द्वारा शास्त्र के साथ शस्त्र का भी प्रशिक्षण देने के बयान पर उठा बवाल भी कम दिलचस्प नहीं. रामदेव के इस बयान को उसके प्रसंग से काटकर हाय-तौबा के अंदाज में पेश करने में चाटुकार मीडिया ने कोई कसर नहीं छोड़ी. एक दिग्गज चाटुकार ने तो बिहार की जातिवादी निजी सेनाओं के अनुभवों और इतिहास से जोड़कर लंबा-चौड़ा मूर्खतापूर्ण विश्लेषण लिख मारा, जिसे एक राष्ट्रीय दैनिक ने संपादकीय पेज की शोभा बनाया.

जबकि सबको मालूम है कि बाबा रामदेव भारतीय राज-व्यवस्था के खिलाफ हथियारबंद संघर्ष छेड़ने वाली कोई सेना बनाने की बात नहीं कर रहे थे. वह तो बस दिल बहलाने के लिए और पूरी सदाशयता के साथ ऐसे नौजवानों को तैयार करने की बात कर रहे थे, जो किसी को पीटें नहीं तो किसी से पिटें भी नहीं. उनके सपनों की इस सेना का हथियार उसके मनोबल और योग से बनी देह के सिवाय शायद ही कुछ हो.

लेकिन इस पर मची हायतौबा के बीच केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने साक्षात लौहपुरूष की तरह घोषणा कर दी कि रामदेव ने ऐसा कुछ किया तो उससे हम फौरन निपटेंगे. ऐसी गर्वोक्ति करते वक्त चिदंबरम यह भूल गये थे कि भारतीय राजव्यस्था को उखाड़ फेंकने के नाम पर ऐसी हथियारबंद सेनाएं पूरे इत्मिनान के साथ दंतेवाड़ा से पलामू तक अपना माओवादी साम्राज्य चला रही हैं. उन इलाकों में घुसने और उनसे दो-दो हाथ आजमाने की कोई योजना, हैसियत या इच्छाशक्ति न तो केंद्र के पास है और न ही संबंधित राज्यों के पास.

इससे यह भी साबित हुआ कि अगर आप वाकई कोई हथियारबंद सेना बनाकर बगावत पर उतरे हों, तो शासन को भीगी बिल्ली की तरह बैठे रहने में कोई शर्म नहीं. लेकिन अगर आप आत्मरक्षार्थ कोई सत्याग्रही सेना की बात भी करें तो चिदंबरम और उनके कलमबंद सैनिक आप पर टूट प़ड़ेंगे. ठीक उसी तरह, जैसे आप भ्रष्टाचार करें, भ्रष्टाचार सहें तो आपकी वाह-वाह, इससे लड़ें तो आप ही निशाने पर होंगे.

अन्ना और रामदेव के आंदोलनों का हश्र चाहे जो हो, इस बहाने कई बुनियादी सवालों ने भारतीय जनमानस में गहरी पैठ तो जरूर जमा ली है. आम तौर पर राजनीति को गंदी चीज समझकर इससे दूर रहने को अभ्यस्त जनमानस के बड़े हिस्से खासकर नौजवानों ने गैर-राजनीतिक तरीके से ही सही, राजनीति के कुछ गूढ़ मंत्र भी समझ लिये हैं. इससे शायद अब भारतीय राजनेता-नौकरशाह-कारपोरेट गठजोड़ को अपनी मनमानी को पहले के तरीकों से जारी रखना आसान नहीं होगा. उन्हें शोषण के और बेशक दमन के भी नये-नये तरीके अपनाने होंगे. ठीक उसी तरह, जैसे जनता भी लड़ने के नये-नये तरीके सीख रही है.

कौन जाने वर्ष 2011 को एक बड़े सबक के ऐतिहासिक दौर के बतौर याद किया जाये. कम-से-कम गांधीवादी सत्याग्राही आंदोलनों की सीमा उजागर करने के लिए तो अवश्य ही.

खुशहाली का पहला खाका

डा. विष्णु राजगढि़या
आर्थिक सलाहकारों की रिपोर्ट का लोकार्पण करते हुए मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा
दस साल के बाद झारखंड ने बदलाव की नयी राह तलाशने का प्रयास किया है। पहली बार राज्य के लिए पंचवर्षीय योजना बनाकर विकास का दीर्धकालीन खाका तैयार करने की कोशिश शुरू हुई है।
स्कूल और कालेज के सैकड़ों छात्र-छात्राओं ने 16 मई को राजधानी के बीएनआर होटल में मुख्यमंत्री और आला अधिकारियों के सामने अपनी समस्याएं बताकर अनगिनत सुझाव दिये। पहले दिन की इस चर्चा से उत्साहित मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा कहते हैं कि विभिन्न विषयों पर ऐसी ही चर्चा राज्य के बुद्धिजीवियों, नागरिकों, तकनीकी विशेषज्ञों के साथ करके हम राज्य को विकास की पटरी पर लाने की ठोस योजना बना रहे हैं।

झारखंड बनने के साढ़े दस बाद भी यह राज्य बदहाली और राजनीतिक अस्थिरता का शिकार बना हुआ है। इस दुखद परिणति का चरम यह है कि अलग झारखंड का आंदोलन करने वाले झामुमो के वारिस व उपमुख्यमंत्री हेमंत सोरेन खुलेआम कहते हैं कि झारखंड अलग राज्य नहीं बना होता और हम बिहार के ही हिस्से रहे होते तो ज्यादा अच्छा होता। बार-बार अल्पमत सरकारों के पतन, बार-बार राष्ट्रपति शासन और हर तरफ भ्रष्टाचार ने इस राज्य को एक नकारात्मक उदाहरण बना दिया है। पिछले साल हुए चुनाव में भी किसी को बहुमत नहीं मिलने, शिबू सोरेन के नेतृत्व में सरकार बनने और चार महीनां में गिर जाने, राष्ट्रपति शासन लगने और फिर अर्जुन मुंडा की सरकार बनने के कारण राज्य का ताना-बाना बुरी तरह बिखरा हुआ नजर आया। इसका लाभ उठाकर राज्य के अधिकांश हिस्सों में तरह-तरह की उग्रवादी और आपराधिक शक्तियों ने इस कदर अपना साम्राज्य कायम कर लिया कि बड़ी-बड़ी घटनाओं के बावजूद पुलिस-प्रशासन के आला अधिकारी चूं तक करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते।

इस निराशा के माहौल में वर्ष 2011 की शुरूआत में दो बड़ी सफलता ने नयी उम्मीदें जगायी थीं। पंचायत के चुनाव 32 वर्ष के बाद सफलता पूर्वक संपन्न होने और सात बार टलने के बाद नेशनल गेम के सफल आयोजन से ऐसा लगने लगा कि राज्य ने अब सही दिशा पकड़ ली है। लेकिन इसी बीच झारखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश भगवती प्रसाद द्वारा अतिक्रमण हटाने सबंधी निर्देश दिये जाने ने राज्य का माहौल एक बार फिर खराब कर दिया। इस निर्देश का अनुपालन कराने के लिए स्वयं मुख्य न्यायाधीश की सक्रियता और राज्य के विभिन्न हिस्सों में मौके पर जाकर मुआयना करने के कारण सरकार पर जबरदस्त दबाव पड़ा। अतिक्रमण हटाओ अभियान के खिलाफ केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय सड़कों पर उतर आये। पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी सात दिनों क अनशन पर बैठे। खुद भाजपा के दिग्गज नेता पूर्व केंद्रीय वि़त्तमंत्री यशवंत सिन्ही को धरने पर बैठना पड़ा। भाजपा विधायक व विधानसभा अध्यक्ष सीपी सिंह ने खुलेआम बागी तेवर अपना लिया।
जाहिर है कि यह दृश्य राज्य को एक बार फिर अंधेरी गली में धकेलने वाला दिखायी देता है।

लेकिन दिलचस्प है कि ऐसी जटिलताओं के बीच मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा राज्य के विकास का खाका खींचने में जुटे हैं। झारखंड विकास के लिए मुख्यमंत्री के आर्थिक सलाहकारों की रिपोर्ट से सरकार को काफी उम्मीदें हैं। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रो विवेक देबराय की अध्यक्षता में बनी इस तीन सदस्यीय समिति में लवीश भंडारी एवं विशाल सिंह शामिल हैं। मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा को इस रिपोर्ट से काफी उम्मीदें हैं। रिपोर्ट का लोकार्पण करते हुए उन्होंने झारखंड के लिए विकास के कारगर रास्ते की तलाश की बात कहकर दरअसल उस पीड़ा को अभिव्यक्त किया जो इस राज्य के हर नागरिक की जुबान पर है।

प्रो0 विवेक देबराय समिति ने झारखण्ड की स्थितियों, संभावनाओं एवं चुनौतियों को रेखांकित करते हुए 170 पृष्ठों की विस्तृत रिपार्ट दी है। इसमें राज्य के लिए विकास कार्यक्रमों का प्रारूप दिया गया है। रिपोर्ट में इन कार्यक्रमों के कार्यान्वयन पर विशेष सतर्कता बरतते हुए हरेक स्तर पर सहभागिता को जरूरी बताया गया है। इस रिपोर्ट में आर्थिक सलाहकारों ने झारखंड की कई विसंगतियों और जटिलताओं को चिन्हित करते हुए वैकल्पिक रास्ते सुझाये हैं।
स्कूल-कालेज के विद्यार्थियों से पंचवर्षीय योजना पर सुझाव लेते हुए मुख्यमंत्री

मुख्यमंत्री साफ शब्दों में स्वीकारते हैं कि झारखंड बनने के दस साल बीत जाने के बाद भी विकास को लेकर जटिलताएं मौजूद होने के कारण ऐसे नवगठित राज्य की प्राथमिकताएं तय करने में दिक्कतें आयी हैं। लेकिन हमें अपनी दीर्धकालिक योजना ऐसी बनानी है जिसके आधार पर बजट का निर्माण हो न कि हम बजट के आधार पर अपनी योजना बनाएं।
श्री मुंडा के अनुसार समिति ने आर्थिक अध्ययन के आधार पर विकास हेतु सुझाव दिये हैं ताकि राज्य अपना एक लक्ष्य लेकर आगे बढ़ सके। देश में प्रगति हुई है परंतु कई प्रकार की जटिलताएं भी स्वतः जन्म ले चुकी हैं। झारखण्ड में भी अनेक आन्तरिक समस्याएं हैं। इनका समाधान करते हुए ही विकास किया जा सकता है। इसके लिए आन्तरिक सुधार परम आवश्यक है ताकि विकास की किरणें समाज के अंतिम पायदान तक पहुँचे।
श्री मुण्डा के अनुसार लोकतंत्र में राजनीति से लोकनीति का स्थान सर्वोपरि है। इसलिए आवश्यकता आधारित जनोन्मुखी समेकित विकास के कार्यक्रमों पर गंभीर चिंतन आवश्यक है।
झारखण्ड राज्य के विशिष्ट सामाजिक-आर्थिक परिप्रेक्ष्य में सरकार चाहती है कि आम-अवाम की भागीदारी से हम राज्य के विकास का रोडमैप तैयार करें ताकि वर्ष 2025 तक की दीर्घकालिक एवं लघुकालिक योजनाओं का स्वरूप निर्धारित कर समयबद्ध दूरगामी परिणामोन्मुख कार्यान्वयन सुनिश्चित किया जाए।
इस क्रम में वैश्विक आर्थिक चुनौतियों के मद्देनजर झारखण्ड की आगामी दो पंचवर्षीय योजनाओं के लिए विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों, विद्वतजनों, संबंधित क्षेत्रों के लाभुकों एवं विशेषज्ञों के साथ चर्चा की। राज्य में लोक सहभागिता पर आधारित योजना परिप्रेक्ष्य  एवं योजना स्वरूप तय करने के लिए समाज के सभी-सभी क्षेत्रों के लोगांे के अनुभव, सोच, चिंतन को समेकित रूप से प्राप्त कर राज्य की दूरगामी परिणामोन्मुख आगामी दो पंचवर्षीय योजनाओं का आधार तय किया जाए।

आर्थिक मामलों के जानकार अयोध्यानाथ मिश्र के अनुसार इस कोशिश के जरिये मुख्यमंत्री इस धारणा को बदलना चाहते हैं कि विकास का कार्य सरकार द्वारा किया जाना है। इसके बदले वह विकास के लिए हर व्यक्ति की सहभागिता पर बल दे रहे हैं।

राज्य के मुख्य सचिव एस.के. चैधरी के अनुसार प्रो. देबराय कमिटी की रिपोर्ट में शार्ट, मिड एवं लांग टर्म इकानोमिक डेवलपमेंट प्रोग्राम दिया गया है । सरकार को  इन सुझावों को कार्यान्वित करना है । इसके कार्यान्वयन पर सभी को एक साथ कार्य करना होगा।

प्रो0 देबराय बताते हैं कि उन्होंने पूरे झारखण्ड का दौरा करके पाया कि झारखण्ड पूरे देश में सबसे तेज गति से विकसित होने वाला राज्य बन सकता है। यह विकास सिर्फ शहरी क्षेत्र में ही नहीं बल्कि ग्रामीण क्षेत्र में भी संभव है। औद्योगिक विकास के साथ-साथ झारखण्ड में कृषि एवं वन्य आधारित विकास की भी प्रचूर सम्भावना है।

आर्थिक सलाहकारों ने प्रथम चरण के अपने प्रतिवेदन में बदलते झारखण्ड के लिए सामाजिक-आर्थिक पहलूओं पर चर्चा की है। दूसरे चरण में केन्द्र राज्य संबंधौं, खासकर वित्तीय संबंधो, समरूप योजना उद्व्यय का निर्धारण एवं आर्थिक-सामाजिक पहलूओं पर समिति को रिपोर्ट सौंपना है। इसमें झारखण्ड राज्य के विशिष्ट भौगौलिक-प्राकृतिक आयामों का विशेष ध्यान रखते हुए राज्य के स्त्रोतों-संसाधनों का पर्यावरणीय दृष्टिकोण से सार्थक उपयोग करते हुए राज्य के विकास की संभावनाओं को रेखांकित किया जाना है।

राज्य की वर्षों से लंबित चल रही सिंचाई योजनाओं की स्थिति की चर्चा करते हुए रिपार्ट में कहा गया है कि दिनोंदिन इन परियोजनाओं की लागत में इजाफा हो रहा है और खेतों को आज तक सिंचाई की सुविधा नहीं मिल पाई है जो व्यापक चिंता का विषय है। अतएव स्थानीय उपलब्ध संसाधनों एवं स्थानीय प्राकृतिक परिस्थियों को ध्यान में रखते हुए लोक भागीदारी पर आधारित दीर्घ अवधि एवं कम अवधि की योजनाओं के कार्यान्वयन की जरूरत है ताकि आने वाले दस वर्षों के बाद भी इन योजनाओं की उपयोगिता हो एवं लक्षित समुदायों को ली गई योजनाओं का फायदा हो।

राज्य के सुदूर इलाकों में विकास की अलख जगाने में जुटे विकास भारती के सचिव अशोक भगत इन कोशिशों को काफी सकारात्मक मानते हुए कहते हैं कि पहली बार ऐसी कोशिश शुरू करके राज्य सरकार ने नागरिकों को विकास में सहभागी बनने का अवसर दिया है। पहली बार हुए पंचायत चुनाव के बाद यह अवसर भी है कि विकास की प्राथमिकताएं तय करने से लेकर उनके क्रियान्वयन और निगरानी तक में जनभागीदारी सुनिश्चित की जाये। सरकार अगर पंचायतों के नवनिर्वाचित प्रतिनिधियों की क्षमता का सदुपयोग कर सके तो राज्य के लिए नयी उम्मीदें जग सकती हंै।

गांव और गरीबों तक पहुंचने की पहल

डा. विष्णु राजगढि़या
झारखंड का राजनीतिक माहौल काफी निराशाजनक है। अलग राज्य बनने के नौ साल में सात मुख्यमंत्री बदले। इस क्रम में विकास के काम भी ठप हैं। निराशा के इस माहौल में राज्य के वरीय अधिकारियों ने गांवों और गरीबों तक सीधे पहुंचकर विकास योजनाओं का हाल जानने की अनोखी पहल की है। इससे राज्य में एक नयी उम्मीद जगी है। 
रांची के एक गांव में डा. एके सिंह

झारखंड के मुख्य सचिव श्री अशोक कुमार सिंह ने राज्य के गांवों में जाकर ग्रामीणों और गरीबों की समस्याओं को समझने और उनका त्वरित समाधान करने का सिलसिला प्रारंभ कर दिया है। सोलह मई को वह कई वरीय पदाधिकारियों के साथ रांची जिले के रातू प्रखंड की कई गांवों में पहुंचे। उन्होंने हर रविवार को राज्य के किसी एक जिले के विभिन्न गांवों का दौरा करने की घोषणा की है।

इस पहल के संबंध में मुख्य सचिव ने नई दुनिया को विस्तार से जानकारी दी। श्री सिंह के अनुसार गांवों तक आला अधिकारियों की सीधी पहुंच से विकास योजनाओं के सफल क्रियान्वयन में काफी मदद मिलेगी। अब तक हम विकास योजनाओं की समीक्षा सिर्फ आंकड़ों के आधार पर करते रहे हैं। इनमें योजनाओं की वास्तविक गुणवत्ता का पता नहीं लग पाता। कई बार आंकड़े भी गलत मिलते हैं। बहुत सी योजनाएं समय पर पूरी नहीं हो पाती। इसके मौलिक कारणों की जानकारी शीर्ष पर बैठे अधिकारियों को नहीं मिल पाती है। मेरी कोशिश है कि केंद्रीय योजनाओं तथा केंद्र प्रायोजित योजनाओं के क्रियान्वयन की वास्तविक स्थिति और जटिलता को वरीय अधिकारी स्वयं देखें और उसका व्यावहारिक हल निकाले। खासकर शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, समाज कल्याण से जुड़ी योजनाओं पर हमारी विशेष नजर है।

झारखंड के लिए यह नयी पहल है। सोलह मई को मुख्य सचिव एके सिंह ने वन विभाग, सिंचाई विभाग, कृषि विभाग, शिक्षा विभाग के आला अधिकारियों के साथ कई गांवों का दौरा किया। रांची के उपायुक्त केके सोन तथा जिले और प्रखंड के पदाधिकारी भी साथ थे। अधिकारियों ने गांवों में तालाब, कुंआ, पोखर, अस्पताल, स्कूल भवन, आंगनबाड़ी केंद्र, कृषि और सिंचाई संबंधी कार्यों का जायजा लिया। मनरेगा और वन विभाग के कार्यों का भी हाल जाना। अधिकारी यह देखकर हैरान थे कि मनरेगा के तहत बने किसी भी कुएं सीमेंट और बालू का उपयोग नहीं किया गया है। मिट्टी से जोड़कर कुआं बना दिया गया। कुंओं को धंसने से बचाने के लिए आरसीसी बैंड भी नहीं लगाया गया। मुख्य सचिव ने इस गड़बड़ी के जिम्मेवार कनीय अभियंता मो आरिफ पर कार्रवाई का तत्काल निर्देश दिया।

श्री सिंह बताते हैं कि गांव तक पहुंचने से यह मालूम होता है कि जनाकांक्षा क्या है। लोगों की जरूरत क्या है और उसे कैसे पूरा किया जाना चाहिए, इसका पता चलता है। एक महिला ने अपने खेत में बांस के पेड़ लगाने का आग्रह किया क्योंकि बांस की मांग काफी बढ़ गयी है। वह महिला जानती है कि एक बार जब बांस निकलने लगेंगे तो उससे अनवरत आय होगी। कुछ ग्रामीणों ने कटहल के पेड़ लगाने की मांग की जिससे 150 साल तक फसल होगी। इसके पत्तों से बकरी भी पल जायेगी और उसकी लकड़ी भी काफी उपयोगी होगी।

श्री सिंह के अनुसार किसानों को मालूम है कि उनकी जरूरत क्या है। लेकिन हम अपनी योजनाएं उन पर थोप देते हैं।
गांव जाने पर अधिकारियों को कई अच्छे प्रयोगों की जानकारी मिली। एक महिला ने मात्र आधा एकड़ जमीन में ड्रीप एरीगेशन के जरिये करेला उपजाकर पूरे परिवार का खर्च निकाल लिया। एसजेएसवाइ योजना में महज एक पंप और ड्रीप एरीगेशन पाइप के सहारे यह काम हो गया। लद्दा गांव में वन विभाग ने विश्व खाद्य कार्यक्रम के तहत 4.75 लाख की पेजयल आपूर्ति योजना से एक हजार लोगों को 24 घंटे पेजयल की व्यवस्था कर दी। श्री सिंह बताते हैं कि माइक्रो लिप्ट एरीगेशन योजना में पांच लाख रुपये खर्च करके 70 एकड़ जमीन में सिंचाई की सुविधा दी जा सकती है। गांव के लोग चेकडैम बनाने की मांग करते हैं क्योंकि इससे उनके कुएं में पानी आ जायेगा। एक स्कूल की क्षत की ढलाई की गयी लेकिन उसे महज सात दिनों में खोल दिया गया। इससे निर्माण की गुणवत्ता खराब हुई। क्षेत्र भ्रमण से ऐसी जानकारियां आला अधिकारियों को सीधे मिल रही है।


सामाजिक कार्यक्रर्ता सुधीर पाल इस पहल को झारखंड में प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह चैपट होने का उदाहरण मानते हैं। श्री पाल के अनुसार अगर राज्य के मुख्य सचिव को थानेदारी करनी पड़े तो इसे संसाधनों की बरबादी माना जायेगा। जरूरत इस बात की है कि सिस्टम खुद अपना काम कैसे करें, इसे सुनिश्चित किया जाये। अर्थशास्त्री डाॅ रमेश शरण कहते हैं कि यह पहल स्वागतयोग्य है। लेकिन राज्य के 32 हजार गांवों तक आला अधिकारी कितने दिनों में पहुंच सकेंगे, कहना मुश्किल है।


मुख्य सचिव एके सिंह के अनुसार यह पहल विकास योजनाओं के निरीक्षण का सिस्टम दुरूस्त करने के लिए ही किया जा रहा है। हर रविवार को किसी एक जिले के गांवों तक पहुंचने की इस योजना में मुख्य सचिव के साथ कई विभागों के सचिव शामिल रहेंगे। लेकिन यह टीम किस जिले के किस गांव में जानेवाली है, इसकी जानकारी पहले से नहीं दी जायेगी। राज्य के किसी भी जिले के किसी भी प्रखंड में यह टीम जा सकती है। इससे राज्य के सभी जिलों और प्रखंडों के अधिकारियों को हरदम सावधान रहना पड़ेगा। भ्रमण के दौरान सारे अधिकारी एक साथ नहीं घुमेंगे बल्कि हर अधिकारी अलग-अलग गांवों का दौरा करेंगे। इस तरह हर रविवार को लगभग चार प्रखंडों के तीस से चालीस गांव तक कवर हो जायेंगे। शाम को सभी अधिकारी एक जगह जुट कर क्षेत्र भ्रमण के अनुभवों पर चर्चा करेंगे और समस्याओं का हल निकालेंगे। दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई भी होगी। इस तरह सिस्टम को नये सिरे से दुरूस्त करना संभव होगा।

श्री सिंह के अनुसार क्षेत्र भ्रमण के साथ ही हर जिले और प्रखंड के अधिकारियों को योजनाओं के संबंध में मासिक लक्ष्य निर्धारित करने का निर्देश दिया गया है। योजनाएं पूरी नहीं होने पर उत्तरदायित्व सुनिश्चित करने की भी बात कही गयी है। श्री सिंह बताते हैं कि विभिन्न कारणों से अधिकारियों ने गांवों का दौरा करने और विकास योजनाओं की स्थिति खुद देखने का सिलसिला बंद कर रखा है। लेकिन जब मुख्य सचिव और कई विभागों के सचिव गांवों में जाने लगेंगे तो पूरी व्यवस्था पटरी पर आ जायेगी। अगर शीर्ष पर बैठे लोग सचिवालय में बैठकर आंकड़ों पर भरोसा करेंगे, तो निचले स्तर के अधिकारी भी कामचलाउ रवैया अपनायेंगे। डाॅ रमेश शरण आला अधिकारियों को राज्य के सुदूरवर्ती गांवों में जाने का सुझाव देते हैं। कहते हैं कि अधिकारियों को आॅपरेशन ग्रीन हंट और उग्रवाद के इलाकों में भी जाना चाहिए। हालांकि मुख्य सचिव पहले से ही इसकी तैयारी कर चुके हैं। श्री सिंह के अनुसार कुछ अधिकारियों ने उन्हें उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में नहीं जाने की सलाह दी हैं। लेकिन वह राज्य के सुदूर और उग्रवाद प्रभावित गांवों में जायेंगे। कारण यह है कि अगर उग्रवादियों का आरोप सरकार पर संवदेनहीन होने का है, तो गांवों तक पहुंचने की यह पहल सरकार के संवेदनशील होने और गरीबों के दुख दर्द से जोड़ने की कोशिश है। यह बात उग्रवादियों को आसानी से समझ में आयेगी और वे इसमें बाधा नहीं डालेंगे।

रांची के उपायुक्त केके सोन इस पहल से काफी उत्साहित हैं। श्री सोन लातेहार जिले के उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में विकास कार्यों के अनुभवों की चर्चा करते हैं। कहते हैं कि उन इलाकों में जब वह विकास योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए लगातार घुमते थे, तो उन्हें कभी भय नहीं हुआ। उग्रवाद के नाम पर विकास योजनाओं में लापरवाही से बेहतर उचित नहीं।
इस पहल के बाद अब राज्य के सुदूर गांवों को आला अधिकारियों के आने और अपनी किस्मत संवरने का इंतजार रहेगा।

Success Stories

A Real Change in My Life – Mohabati Nayak
 
My name is Mohabati Nayak and I am living in Ormanjhi, Ranchi. I was working as a daily wager. One day I met Ms.Prabha Toppo, she is one of the members of District Education Committee and she gives me some of the information about stitching clothes, which was provided by one of the reputed organizations, Vikash Bharti, Bishunpur in Ranchi. I took the initiative and got admission in stitching course. Now I am self employed and earning Rs.2500 per month through my own shop. Today I am self dependent and happy. I need not go anywhere in quest of employment.

 
·         My name is Helarose Toppo; I belong to Latehar district. I have taken training in 2008 under Yuva Jyoti. I want to see myself as a good motor-cycle mechanic. With the help of Vikas Bharti and State Bank of India-Chandwa branch I opened my own shop. At the beginning some of the motor -cycle mechanics tried to create problems for me. Then it was very difficulties for me to survive, but now my earnings have reached to Rs.4000-5000 due to Vikas Bharti's support”.